राष्ट्र वंदन
By धनंजय प्रताप शर्मा
नमो कोटि पुत्रों की माता,
नमो राष्ट्र के भाग्य विधाता,
नमो गोमती, सरयू, गंगा,
नमो राष्ट्र का मान तिरंगा,
नमो हिमालय, शैल सुताएं,
नमो क्रांति की दशों दिशाएं,
नमो बृज की कंचन माटी,
काश्मीर की केसर घाटी,
निर्झर, निश्चल, प्रखर, मनोहर,
अटल, अजेय यह राष्ट्र धरोहर,
दुर्गम, विषम, वीराने पथ पर,
आरूढ़ होकर विजयी रथ पर,
जिन बेटों के पांव गल गए,
संघर्षों में स्वप्न दल गए,
जिसने न देखा उजियारा,
जिसको छूकर तम भी हारा,
अमर ज्योति का पूज्य भाल,
नतमस्तक हो नगपति विशाल,
सिंधु जिनके चरण गह रहा,
अंबर जिनका शौर्य कह रहा,
व्यर्थ नहीं शोणित का तर्पण,
व्यर्थ नहीं जीवन का अर्पण,
नील गगन पर छाया केतु,
आकुल हृदयों का बनकर सेतु,
कुछ कसक रही आज़ादी की,
शत्रु ने माँ को व्याधि दी,
गिलगित की क्यों गारो से दूरी?
पंडित श्यामा की आस अधूरी,
किन्तु पाने को खोया गौरव,
आज उठ गया सोया भैरव,
जलियांवाला बाग कह रहा,
निर्मल होकर क्यों दाग सह रहा?
आतंकी आते हैं आएँ,
सर पर मँडराये विपदाएँ,
कोटि जन-मन आज डटेगा
लिय राष्ट्र का मान,
दुनिया के सम्मुख नहीं झुकेगा,
य़ह मेरा हिन्दुस्तान।
By धनंजय प्रताप शर्मा

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