राम-विवाद
By Jeeshant Mathur
आज राम में और मुझ में विवाद सा होगा
मैं मिला उनसे तब जब सब बरबाद सा होगा
मैंने पुछा क्या ज़रुरत थी तुम्हे सीता को पाने कि
लंका से तोह ले आये मगर हिम्मत नहीं आये निभाने कि
छोड़ दिया फिर से वन्न में जहा वह अकेली थी
तुम राज पाठ का लाभ उठा रहे थे वह पल पल तुम्हारा नाम ले रही थी
उसका तोह कोई नहीं था तुम्हारे अलावा जहां में
प्राण नाथ कहलाते हो भूल गए तुम ही तोह उसके प्राण थे
तुम्हारा समाज कहता हैं सीता का चरित्र साफ़ कैसे
वह तोह किसी और के घर रहकर हैं आयी,
तोह तुम्हारा सामाज भी कौनसा सीधा हैं भाई,
यह वह समाज हैं जो सीता पर लांछन लगता हैं
तुम्हारी पीट के पीछे तुम्हे भी कपटी बुलाता हैं
तुम्हारी एक भूल आज सब खराब कर दीया
राम तोह कही हैं नहीं मन में रावण भर दिया
यह दुनिया कहती हैं राम कण कण में हैं
राम हर आँगन में हैं
मन से रावण जो निकाले राम उसके मन में हैं
यार न हम्हे रावण चाइयेः न ही हम्हे राम चाइयेः
सीता से जो परीक्षा न मांगे उसे उठाकर जो न ले जाए उसे वन्न में जो न भेजे
ऐसे कुछ इंसान चाइयेः
फिर शायद सीता भी तूम्हे उस दिन माफ़ कर पायेगी,
जिस दिन आज की सीता हर सड़क हर शहर हर घर में मेहफ़ूज़ हो जाएगी!
By Jeeshant Mathur

Comments