राम-बाण
By Pravesh Vyas
नाम ना लूँ इस भूत का मैं
इस भूत को भूत (भूतकाल) बना डालो,
विनती करूँ प्रभु से के, तुम
राम-बाण चला डालो।
हो विनाश इस राक्षस का
इसे भू से पार लगा डालो,
विनती करूँ प्रभु से मैं
तुम राम-बाण चला डालो।
ना अर्थ है कुछ
यह व्यर्थ ही तो है,
ना भय है इसे
यह अनर्थ ही तो है।
सृष्टि के परम पितामह तुम
कलियुग का युग बदल डालो,
है यह नरसंहार महाप्रभु
तुम राम-बाण चला डालो।
(भगवान कहते हैं)
जीव-हित की सोच धरे तू
अर्थ-अनर्थ की बात करे,
आज देख राक्षस को तू यहाँ
नर-विनाश भय गान करे।
युद्ध ना ये अनर्थक है,
यह युद्ध तो लक्ष्य अपार धरे,
जो बोए सो फल पाए
फिर क्यों होनी-आघात डरे।
तेरे कर्म बीज फूटे हैं,
अब जितना कर तू आवाहन,
आत्मसुधार का पहरा है ये
अब झाँक अपनें ही अंतर्मन।
जब जब आन पड़ी कठिनाई
तब तब मैंने जन्म लिया।
जन्म लिया था मैंने नहीं
इस सृष्टि ने मुझे था जन्म दिया।
मुझे जन्म दिया,
एक धर्म दिया,
पुरुषार्थ दिया, मुझे कर्म दिया।
मैं कर्म किया,
आभास किया,
बुराई जीत विश्वास किया।
देख मनोबल अड़िग खड़ा था
लोगों ने सम्मान दिया,
बुराई को दिया शैतान नाम,
और नाम मुझे भगवान दिया।
कर्म किए, भगवान बना हूँ
इस बात को तू भी जान ले,
सार यही है मन-जीवन का
इसे जल्द पहचान ले।
इस शैतान का संहार लिखा है
तेरे हाथों ही होने वाला,
तो लगा मनोबल,
उठा नज़र,
और धैर्य कभी ना खोने वाला।
हाथ जोड़ तुझसा मैं खड़ा हो जाता,
तो आज करता तू किसकी पूजा।
सत्कर्म कर, पहले सरल कर जीवन
कर फिर कोई कार्य दूजा।
यह लड़ाई मेरी नहीं
जो कर्म-बाध्य में बंध जाऊँ,
शिव रूपी हूँ अडिग अमर पर
यह पाप हलाहल ना जी पाऊँ।
विचार मंथन कर,
खुद घूँट हलाहल,
यह विचार कौतूहल नारी है,
निद्रा त्याग और देख सवेरा
तू खुद एक ग्रसित बीमारी है।
मैंने लड़ी अपनी लड़ाई,
इस बार तुम सब की बारी है,
मनोबल का सब कसो कमान
अब युद्ध की यह तैयारी है।
ना अर्थ है कुछ
यह व्यर्थ ही है,
निर्भय है ये अनर्थ ही है
चिन्ता गहरी कितनी हो, तुम जागो,
वक्त बदल डालो,
रोको अब यह नरसंहार तुम
एक जुट, युग बदल डालो।
राम बनो या बनो रूद्र तुम
प्रहार नगाड़े बजा डालो,
सृष्टि का कल्याण करो तुम,
मेरा बाण चला डालो।
By Pravesh Vyas

Comments