राधे-राधे!
By Sarthak Gupta
कदंब की डाल पर पीताम्बर ओढ़े अधरों पर बाँसुरी लिए
सुर छेड़ रहे गोविंद
गैया चराते ग्वाले
खिल-खिला रहे प्रतिदिन
बाँसुरी के सुरों में सजा है ब्रज सारा
गोपियाँ भर रहीं यमुना का मीठा जल न्यारा
गोप कर रहे विश्राम खेतों की मिटाने थकान
वहीं दूसरी ओर कुछ गोपियाँ मैया से कर रहीं
माखन चोरी का बखान
चंचलता से भरा पूरा आसमान कर रहा खिल-खिला कर बातें
पूरे ब्रज में एक ही तो है नंदगोपाल जिसे कोई ना डांटे
जेसे ही छिड़ती है मधुर तान पशु-पक्षी हो या पेड़-पौधों
या हो मनुष्य या हो यह वायु, जल, सूर्य, आकाश
सब मंत्रमुग्ध हो जाते हैं छोड़ कर अपने सभी कार्य
भक्ति का रस पान करतें हैं सब छोड़ अपने कार्य अधूरे-आधे
सब के दिलों से प्रेम भरी एक ही आवाज़ आती है-
राधे-राधे! राधे-राधे!
By Sarthak Gupta

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