रह जाएँ ता –उम्र
By Kavita Batra
हर किसी के लिए रह जाएँ ता -उम्र ,
हर किसी के लिए रह जाएँ ता -उम्र ,
इतना भी काबिल नहीं,
मैं इन्सान हूँ, कहीं का खुदा नहीं।
मेरे रहने पे , मेरी जाने की बात करते हो ,
मेरे रहने पे , मेरी जाने की बात करते हो ,
जब जाएँ हम यहाँ से , तो मेरी मय्यत पे आना नहीं।
मैं शुक्र करता हूँ उनका , जो सच मे रोयेंगे,
मैं शुक्र करता हूँ उनका , जो सच मे |रोयेंगे,
दुआओं मैं रहेंगे हम भी कहीं,
फक्र है की इतने भी , काफिर हम नहीं।
By Kavita Batra

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