रस्साकशी
By Apurva Banthia
आज पार्क में
बरबस ही खींचा चला आया.
बच्चों की मासूमियत में,
उनकी रस्साकशी में
मैंने अपनी कशमकश
का मज़ाक उड़ता पाया.
दो पाले हैं
आमने सामने
खिलाफत का ढोंग रचते.
जकड़ रखी है,
दोनो हाथों से,
मरोड़ें दे दे कर,
कमर कस के,
एक डोर
जो जुड़ती है सीधा
सामने वाले पाले से.
लकीर खींच दी
बीच से,
एड़ियां गढ़ाए
डटे रहे अपने ही पाले में.
चीखे चिल्लाये भी,
मानो जंग छेड़ रखी हो.
पर ये जंग,
ये खिलाफत,
सब ढोंग ही तो है.
रस्साकशी का
मकसद सिर्फ इतना है,
सामने वालों को
अपने पास खींच लाना.
बड़ा प्यारा खेल है.
शायद प्यार
यही खेल है.
By Apurva Banthia

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