रंगीन कागज़
By Simran Thakur
जरुरत, शौक, गुनाह, इत्यादि
बन गए हैं आज इसके पर्यायवाची।
हर दोष हो रहा इसमे निहित
विभीन्न प्रकार की पत्तियां करें पीड़ित।
होती है यहां हर रंग की अपनी कीमत
जीवन इनके आगे केवल एक तुच्छ कीट।
महत्व धन का इंसानियत से ज़्यादा
हर वस्तु का मूल्य अदा करना पड़ता।
भेदभाव की रची इसने नई परिभाषा
किसी के हस्से सुखे तालाब;
तो किसी के पास अनंत सागर-सा।
अजीब है आयत आकार का खेल
स्वयं इंसान बिक जाता इनके आगे,
"पैसा-पैसा" करते-करते।
दाव पर लगा अपनी जिंदगी
निकल पड़ते कमाने
तबाह किये अंगिनत घर भी
अधिक-अधिक की लालच ने।
नोट बन गए पेट की जरूरत
चाहत की हद इनकी करे खुशियों का अस्त।
उपस्थिति देती बर्फ-सी ठंडक,
परंतु लोभ हैं हिमस्खलन की दस्तक।
जुर्म के पीछे का चेहरा
लत इसकी कर देती अंधा
सही-गलत अंतर को नष्ट करती
यह आयत रंगो की दुनिया।
जकड़ लिया है सबको ऐसे
मानो सर्कस के जानवर पिंजरे में।
हर दिन चाहिए साथ इनका,
जैसे शरीर का कोई जरुरी हिस्सा।
कैसे सुख देते हैं पैसे?
अपनो को दूर करे अपनो से।
लोग ले रहे एक-दुसरें की जान
देकर क्रुरता को अपने-अपने नाम।
बेइमानी, काला बाजारी, चोरी भी इसके अंश
गैर-मौजूदगी नींदें उड़ाकर करती तंग।
नहीं यह किसी का सगाह
हल और परेशानी दोनो की यही वजह।
संभलना होगा अब
बरबाद ही नहीं,
बचा भी सकते हैं पैसे से जीवन।
मुल्य चाहतें हो अगर किसी का
तो मनुष्यता को बनाओ मुल्यवान।
मात्र कुछ रंगिन पत्तो के लिए,
मत छिनो किसी की सांसे
मत बेचो अपना इमान,
डालकर मृत कागज़ो में जान।
By Simran Thakur

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