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रंगीन आसमान

Nov 10, 2022
4 min read

By Shivani Singh



रानी आज अपने धर में सबसे पहले उठ चुकी थी, और उठते ही सबसे पहले उसने अपनी रंग-बिरंगी पतंग, जो उसके कमरे में रखी कुर्सी पर पड़ी थी, को परखा है ।

अधखुले नैन, आँखों में नींद लिये वो अपने बगल में सोई हुई माँ को जगाती है। उसके छोटे नन्हें पांव और कम कद अभी भी बाथरूम के स्वीच तक नहीं पहुँचते थे। उसके बाहर निकलते ही माँ ने वापस सोने को बोला पर रानी की आँखों में बस नीले आसमान में उड़ती उसकी पतंग नजर आ रही थी। माँ ने खिड़की से पर्दा हटांकर रानी को बाहर का अंधेरा दिखाते हुये कहा “इसमें तुम्हारी पतंग के रंग को कोई नहीं देख पायेगा] अभी सो जाओ जब उजाला होगा तो चली जाना।”

रानी ने अपनी माँ की बात मानकर मम्मी पापा के बीच सोने चली गयी पर उसके आँखों में खिड़की से आती हुई पहली किरण का इंतजार था। लेटने पर उसके पापा खिड़की के बीच आ रहे थे तो वो उठ कर बैठ गयी। माँ ने ये देखकर उसको सोने की हिदायत दी। वो मन मारकर लेट तो गयी पर अपना सर उसने अपने पापा के कंधे पर रख लिया,जिससे खिड़की का थोड़ा हिस्सा उसको नजर आने लगा। जागती हुई किरण के साथ उसकी आँखों बंद हुई और वो बादलों के बीच अपने पतंग की ड़ोर पकड़े भाग रही थी। उसकी नारंगी पतंग जिसमें आसमानी रंग के टुकड़े चिपके हुये थे, अपनी हरी पॅूंछ के साथ इतराते हुये आसमान में लहरा रही थी।

उसकी आँख खुली तो बाहर उजाला हो चुका था] खिड़की से पर्दा हट चुका था और जनवरी की भिनी सी धूप और मनचाही शीत रानी के गालो को छू जा रही थी। ये देख वो धबरा कर हॉल की ओर अपनी माँ को ढॅ़ूढ़ते हुये भागी। किचन में उसकी माँ गरम-गरम पुड़ियाँ तल रही थी, और दूसरी गैस पर चाय और ईलायची की सोंधी खूशबू से पूरे घर को महका रही थी।

उसने माँ के पल्लू को खीचते हुये अपने मधुर आवाज में बोला “ माँ मुझे देर हो गयी जल्दी से मेरी पतंग में डोर लगाओ मुझे जाना है।”

माँ ने हॅंस कर उसको बताया कि अभी उसके दोस्त नहीं आये हैं और काफी वक्त है वो नहाकर तैयार हो जाये फिर नास्ता कर पतंग उड़ाने जा सकती है। झट से नहाकर उसने अपने पसंदीदा पीले रंग के फ्रॉक पहनी और डायनिंग टेबल पर जा बैठी। पापा अखबार पढ़ रहे थे और उनको देख उसको अपने पतंग की डोर याद आ गयी। अपने नन्हें पांव से भागते हुये अपनी पतंग को लाकर उसने अपने पापा के सामने रख दिया।

पापा का कुर्ता खिंच उसने अपने नीली बड़ी आँखों से उनकी तरफ आशा से देखा। पापा ने मुस्कुराकर उसके अपनी गोद में बैढ़ा लिया और डोर को बांधना शुरू कर दिया। हर एक छेद के साथ रानी की दिल की धड़कन बढ़ रही थी, कि कहीं उसकी पतंग फट ना जाय। पतंग के बंध जाने के साथ ही नास्ता टेबल पर आ गया था।

पापा के हाथों से गरम-गरम पूड़ियाँ खाना रानी को बेहद पसंद था, पर आज उसके अंदर का धैर्य चंचलता का रूप ले रहा था। मूकूल, सोनू, मोनू और चिक्की, चारो अपनी-अपनी पतंग लेकर रानी के घर के दरवाजे से आवाज लगा रहे थे। पापा के हाथों का आता हुआ कौर रानी के निगाहों से धुंधला चूका था। पतंग लेकर वो वाहर भाग गयी।

पंतग उड़ाने का पूरा कार्यक्रम चंदू के धर था क्योंकि उसका बड़ा भाई मूकुंद ही एक एैसा व्यक्ति था जिसे पतंग उड़ाना आता था। बाहर निकल जब रानी ने आसमान को देखा तो आज रोजाना से ज्यादा चिड़िया दिख रही थी I इनके आकर और रंग भिन्न- भिन्न थे I कुछ देर बाद रानी को समझ आया की ये तो पतंगे थी I

पिछले सात सालों में, रानी की, पतंगो वाली यह पहली खिचड़ी थी। ये रंगीन आसमान उसने पहले कभी नहीं देखा था।

चंदू की छत की एक तरफ टेबल पर शरबत और गुजिया रखी थी, और बीच में उसका भाई मूकुंद पतंग उड़ा रहा था, जो रानी को नजर तक नहीं आ रही थी। बाकियों ने एक दूसरे की मदद से अपनी-अपनी पतंग को छोड़ैइया दिया पर सभी एक दो पल में निचे आ गिरी। ये पूरा नजारा बगल की छत वाली लड़कियों का समूह देख रहा था।






वो छत फांद कर इस छत पर आ गयी और सारे बच्चों की पतंग उड़ाने में मदद करने लगी। रानी की पतंग की डोर शमा के हाथों गयी। उसकी लाली भरी मुस्कान और लहराते बालों से रानी को प्यार हो गया था, एक पल के लिये उसे अपने पतंग भी फिकी लगने लगी थी।

पर कुछ ही देर में उसके सपने की तरह उसके नारंगी पतंग आसमान में उससे कई दूर गोते खा रही थी। ये दृष्य देख रानी की आँखें बड़ी हो गयी और उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वो चहचहाते हुये वहीं खड़ी हो ताली बजाने लगी। उसकी आँखों बस अपनी पतंग का पिछा कर रही थी कि तभी पतंग और डोर का साथ टूटता नजर आया।

उसकी पतंग डोर से आजाद हवा संग बहते हुये गिर रही थी। रानी के आँखों में आँसू भर आये थे जब शमा ने उसका हाँथ पकड, उसको पतंग की ओर ले जाना शुरू किया।

सड़क पर उतर रानी ने भांप लिया था कि उसकी पतंग बस कुछ दूर गिरने वाली है और शमा के साथ उसने दौड़ लगायी। दौड़ते-दौड़ते उसके अंदर के सारी उदासी खत्म हो चुकी थी, इस गति में एक आनंद आ रहा था। शमा की मुस्कान उसको और उत्तेजित कर रही थी। ठीक उसी पल उसकी पतंग तेजी से गिरती नजर आयी, शमा और पतंग की बीच बस कुछ पलों का फासला था। शमा ने एक छलांग लगयी और पंतग की ड़ोर से पतंग पकड़ ली। रानी और शमा दोनो ने अपने बचपन का भरपुर आनन्द लिया था।


By Shivani Singh








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