रौशनी
By Vidushi
रोशनी शब्द कई संदर्भों में प्रयोग हो सकता है,परंतु इसका सटीक अर्थ मेरी समझ से वो जो मन मस्तिष्क के अंधेरे दूर करें,वो जोबांटने से बढे,बस ऐसी ही है मेरी रोशनी की कहानी।
मैं हर रोज़ की तरह सुबह सैर पर निकली,उस दिन अपनी ही उलझनों में अनमनी सी बहुत दूर तक नहीं गई,मनकी कुंठाओं से झुंझलाती रास्ते में डिवाइडर पर जा बैठी,पास में दो छोटे बच्चे एक तकरीबन आठ साल का ,दूसरी जब साल की अपनी बीवी हुई कचरे की थैली में से कुछ पन्ने निकाले और उल्टा सीधा कर तस्वीरें देख कर मुस्कुरा रहे थे। मैं यहां बता दुं कि पेशे से शिक्षाविद् हूं,रहा नहीं गया पन्ने सीधे करते हुए:उल्टी किताब पढ़ रहे हो। क्या देख रहे हो उसमें? लड़का: तुम इसमें क्या देखते हो? मैंने पन्ने देखे:बहुत कुछ,उसने पन्ने मेरे हाथ से खींचे और आगे चल दिया।वो लड़की मुड़ मुड़ कर देखती रही,अरे नाम तो बताते जाओ , लड़का तुनक कर: मैं राजू और ये बंसी।
मैं: इन पन्नो में हम क्या देखते हैं जानना है?
राजू: खाना खिलाओगी
सही कहते हैं लोग पहले पेट पूजा फिर काम दूजा।
मैं: चलो इस पराठा हाउस में खाते हैं।
खाना टेबल पर आते ही, उनके चेहरों की चमक देखने जैसी थी,खाते -खाते मैंने पूछा:पढ़ोगे?
राजू: वो क्या होता है? उसमें क्या क्या होता है,पैसे मिलते हैं? सवालों के बाण एक के बाद एक
अभी कुछ कह पाऊं एक और : क्यों करना है पढ़ाई?
सवाल गहरे थे,पढ़ना क्या होता है ? कैसे समझाया जाए ,मैने भी झट मिट्टी में चार पांच अक्षर लिखे, फिर पूछा: ये क्या हैं?
दोनों:आड़ी अवरी लिटियो छे(गुजराती शब्द )
मैं: ये बंसी लिखा है, (दोनों हैरानी से मुस्कुराए) ये टेढ़ी मेढी लकीरों को समझना ही पढ़ना कहलाता है,तुम वो पन्नों के चित्र देखकर तुम मुस्कुराए,हम समझकर
बंसी: सुबह देखा है मैंने,बस में चढ़कर एक जैसे कपड़े पहनकर बड़ी थैलियां लेकर वो हमारे जैसे लोग ये समझने जाते हैं?
मैंने कहा : हां
पराठा हाउस का मालिक हमारी बातें सुन रहा था,मेरी बात काटते हुए: इनकी किस्मत में कालिख की कोठरी है और ये कचरे की थैली ,खाओ और भागों यहां से ,ये पढेंगे!
बंसी न खाना खिसका के फेंका: चल राजू ,ये कूड़े जैसे खाने से तो हमारी सूखी रोटी अच्छी। वो पन्ने देखते समय जो रोशनी थी आंखों में अब वो आंसू बनकर टपकी।
मैंने फिर आवाज़ लगाई: मैं समझाऊंगी,अगर पढ़ना चाहो तो
राजू:खाना खिलाओगी रोज़,ये खाना बहुत अच्छा है।
मैंने होटल वाले भैय्याजी को उम्मीद से देखा: हां! लेकिन रोज़ पढ़ने के बाद,बंसी झट से मुझे लिपट गई,उसको कालिख की कोठरी में रोशनी दिखी हो।
उनके पढ़ने की ललक ने मेरे अंदर भी नमी ऊर्जा भर दी।कल नयी सुबह लेकर मिलने के वादे से मैंने विदा ली।उनकी शिक्षा की तरफ छोटी सी रोशनी में अगर मैं लौट बनी तो होटल वाले गुप्ताजी बने तेल जो ये रोशनी बनी रहे , इसलिए मुफ्त खाना खिलाते हैं।
ज़रूरी नहीं रोशनी के लिए छलांग जलाए जायें,शिक्षा से घर और शिक्षित से समाज रौशन हो सकता है।
By Vidushi

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