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ये कौन से धर्म को तुम अपने अंदर पाल रहे ?

By Deependra Srivastava


जिस धर्म के विचार को मैंने जाना है

उसने मेरी चेतना का विस्तार किया है

मेरे अहंकार को उजागर कर

उसको एक सही दिशा का रूप दिया है

तुम जो बँट रहे हो

कभी भाषा , कभी रंग , कभी मजहब के नाम पर

तुमसे सवाल मेरा है ये कौन से धर्म को तुम मान रहे हो ?

कभी रुक कर सोचा है ये जिसको काफिर समझ तुम मार

रहे क्या वो अल्लाह के बंदे नहीं ?

और है सब एक तो तुम जातियों का सहारा लेकर किसी को

नीच तो क्या किसीको सर्वश्रेष्ट मे बाँट रहे ?


ये सूरज चाँद सितारे फिर क्यों एक है

ये क्यों रौशनी सबको एक – सी बाँट रहे

जब सबके भगवान है अलग तो तुम एक धरती पर निवाश

क्यों कर रहे ?

किसीको अछूत तो किसीको अपने सर चढ़ा रहे ये धर्म की

कौनसी किताब से सीख रहे ?

तुम राजनीति का पाठ पढ़ा कर क्यों धर्म को बदनाम कर

रहे?

पाक – साफ धर्म को क्यों गंदा कर रहे ?

रास्ते अनेक है मंजिल एक ये क्यों नहीं देख पा रहे

खुदकों रास्तों मे बांटकर क्यों खुदकों भटका रहे

ऊर्जा के सिद्धांत को तुम क्यों नहीं अब तक समझ पा रहे ?

तुम दूसरों पर इल्जाम लगा रहे

पर धर्म के मूल को तुम भी नहीं जान पा रहे

क्या धर्म का मतलब सिर्फ इतना है की एक पंथ ,

संप्रदाय को विस्तार देना

या अपने अज्ञान से उठकर खुदका विस्तार करना


क्या मानव चेतना का विस्तार करवाना धर्म का एक मात्र

उद्देश्य नहीं


By Deependra Srivastava

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