युद्ध की विभीषिका
By Dr. Seema Varma
युद्ध आसमान से नहीं उतरते
युद्ध मानव आँख में होते हैं|
युद्ध ज़मीन पर पैदा होते हैं,
और ज़मीन के लिए पैदा होते हैं|
अहंकार दिशाएँ नहीं करतीं
प्रकाश की ओट से झाँकती दिशाएँ
अँधेरे को स्वयं में समेटती दिशाएँ
परतंत्रता के परे दिशाएँ
अष्टमुखी दिशाएँ
मानव की गति निर्धारित करती दिशाएँ
ग्रहों को गतिमान करती दिशाएँ |
और ब्रह्माण्ड में स्थान बदलते ग्रह
चलायमान ग्रह
मानव को ज्योतिष सिखाते ग्रह
युद्ध की विभीषिका तय करते ग्रह|
पर युद्ध
आसमान से नहीं उतरते
महत्वाकांक्षा और अहंकार के साहचर्य से
लोभ की प्रसव पीड़ा झेल कर
युद्ध ज़मीन पर ही पैदा होते हैं|
By Dr. Seema Varma

यह कविता बेहद गहरी और सोच में डालने वाली है। शुरुआत में ही यह धारणा तोड़ देती है कि युद्ध कहीं बाहर से आते हैं—कवि बहुत सहजता से दिखाता है कि उनका जन्म हमारे भीतर के अहंकार, महत्वाकांक्षा और लोभ से होता है। दिशाओं और ग्रहों का प्रतीकात्मक उपयोग कविता को एक ब्रह्माण्डीय विस्तार देता है, लेकिन अंत में फिर से मनुष्य के स्वभाव पर लौट कर असर और भी तेज हो जाता है। “लोभ की प्रसव पीड़ा” जैसी पंक्तियाँ लंबे समय तक मन में गूंजती रहती हैं। कुल मिलाकर, यह कविता संवेदनशील भी है और तीखी भी—पढ़कर रुककर सोचने पर मजबूर करती है।
So nice!
Vice nice. Good read and amazing thoughts.
Amazing read. Nicely articulated.
Very nicely articulated. Good read.