युद्ध
By Dhruwa Shankar Prasad
"वसुधैव कुटुंबकम् " धरोहर हमारी
सहिष्णुता है पहचान हमारी
बन जाए अच्छाई जब भूल हमारी
युद्ध को स्वीकार कर ।
जग सकल सबल को समझता
मान सम्मान उसे ही मिलता
कहलाए दुर्बलता जब मौन हमारा
युद्ध को स्वीकार कर ।
शत्रु जब प्रहार करे
निहत्थों पर वार करे
युद्ध को स्वीकार कर
शत्रु का संहार कर ।
हुंकार भर , प्रतिकार कर
संकट में हो राष्ट्र अगर
युद्ध को स्वीकार कर
शत्रु का संहार कर ।
By Dhruwa Shankar Prasad

Nice poem
Nice poem
Nice one 👍
Very nice poem