यादों की तरकश
By Dushyant Singh Sisodia
नादान ज़िंदगी-ए-जहान में हम बस माज़ी तरकश में अवेरते आए,
जब तरकश-ए-माज़ी टटोलनें का वक़्त मिला लगा मानो उठा लाए तरकश आपकी
साथ।
ज़िंदगी की गेहरी सरसराहट में यूहीं चल दिये आप,
तरकश तो सही मगर माज़ी ना मेरी ना तुम्हारी थी हमारी साथ।।
By Dushyant Singh Sisodia

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