यात्रा- अहंकार से निराकार तक - By Rekha Vinit Jindal
Written By: Rekha Vinit Jindal
Category: essay
Competition: Global Poetry and Creative Writing Competition 2026
Rekha Vinit Jindal graces us with her insightful essay "यात्रा- अहंकार से निराकार तक" in the esteemed category of Essay for the Global Poetry and Creative Writing Competition 2026. Through her adept prose, Jindal offers a profound exploration of ego, interweaving Indian philosophical concepts with modern psychological perspectives. This thoughtful piece beckons readers on a journey beyond the superficial confines of societal norms towards the expansive realm of self-realization.
About the Work
"यात्रा- अहंकार से निराकार तक" delves into the intricate relationship between ego and self-awareness. The essay employs vivid imagery and Indian symbols such as clay and fire to articulate the transformative journey from rigid conformity to authentic self-discovery. Jindal's narrative challenges readers to transcend societal masks and embrace their innate creativity, urging a departure from mere rule-following to a deeper understanding of existence.
यात्रा- अहंकार से निराकार तक
Original Submission by Rekha Vinit Jindal
यात्रा- अहंकार से निराकार तक
प्रस्तावना
यह निबंध 'अहंकार' को केवल आध्यात्मिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व, सामाजिक संस्कारों और मनोवैज्ञानिक संरचना से जोड़कर देखने का प्रयास है। मिट्टी, अग्नि, प्रकृति और सामाजिक मुखौटे जैसे भारतीय प्रतीकों के माध्यम से यह रचना बताती है कि जीवन का उद्देश्य नियमों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि स्वयं की मौलिकता को पहचानते हुए अहंकार से निराकार की यात्रा करना है। यह निबंध भारतीय दर्शन और आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि के समन्वय का एक विनम्र प्रयास है।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
जीवन की इस अनंत सृजन-शाला में हम सभी एक मिट्टी के पात्र की भाँति हैं। जिस प्रकार कच्ची मिट्टी को उपयोगी बनाने के लिए उसे चाक पर चढ़ना पड़ता है और अग्नि के ताप से गुजरना पड़ता है, उसी तरह हमारे जीवन में 'नियम' उस अग्नि के समान है। हमारे व्यक्तित्व को मजबूत बनाने हेतू यह ताप आवश्यक है। लेकिन यहीं एक सूक्ष्म खतरा छिपा है—यदि अग्नि की अधिकता हो जाए, तो घड़ा फूट जाता है। वैसे ही यदि नियम-पालन ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाए, तो संवेदनाएँ झुलस जाती हैं और व्यक्ति रूखा व चिड़चिड़ा हो जाता है; जीवन मात्र एक यांत्रिक प्रक्रिया बन जाता है।ऐसे में नियम हमारी पहचान बन जाते हैं और “अहंकार” जन्म लेता है। इतिहास में हमें ऐसे अनेक दृष्टांत मिल जाएंगे जहाँ व्यक्ति के कठोर व्रत ने जीवन को संग्राम में परिणत कर दिया। सार्थकता नियम के 'कठोर' पालन में नहीं, बल्कि जीवन को 'उपयोगी' बनाने में है।
जिस प्रकृति ने स्वयं की गोद में हमें आश्रय दिया है वो माँ की भांति हमें सतत प्रेम से जीवन में नियम का स्थान बता रही है। प्रकृति सिखाती है कि नियम जड़ नहीं, जीवंत होते हैं। वे जीवन की रक्षा के लिए हैं, जीवन को बाँधने के लिए नहीं।
बीज अपना कवच तोड़े बिना अंकुरित नहीं हो सकता, वृक्ष पूरे वर्ष हरे-भरे नहीं रहते, नदी कभी सीधी रेखा में नहीं बहती। प्रत्येक रूप में प्रकृति मानो कह रही है कि नियम का टूटना ही वो एकमात्र नियम है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अटल सुचारु रूप से संचालित करता है।
जीवन का संचलन तब बाधित होता है जब हम स्वयं पर 'सामाजिक मुखौटा' चढ़ा लेते हैं। बचपन से हमें "अच्छा बच्चा" बनने की प्रेरणा दी जाती है , पर यह कोई नहीं समझाता कि अच्छाई की परिभाषा क्या है ;आवश्यकता क्या है? हम एक सामाजिक छवि को पालने-पोसने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हम भूल जाते हैं कि हम उस मिट्टी से बने हैं जिसकी प्रकृति सृजन है, प्रदर्शन नहीं। जब जीवन मात्र नियमों का प्रदर्शन बन जाता है तब जीवन कठपुतली बन जाता है। एक ऐसे मनोवैज्ञानिक पिंजरे में कैद हो जाते हैं जहाँ स्वयं के नियम से परे कुछ देख नहीं पाते और अपने भीतर के यथार्थ की बलि चढ़ा देते हैं। अक्सर अस्वीकार किए जाने का भय हमसे अच्छा आचरण करवाता है ना कि हमारे भीतर की अच्छाई।
माटी का पुतला अपने ही आकार का बंदी बन गया; मिट्टी होना भूल गया। मिट्टी—जो बिना किसी शोर या प्रशंसा की चाह के निरंतर सृजन करती है। हम तो एक छोटी सी कलाकृति बनाकर भी सराहना और स्वीकृति चाहते हैं। जब हम स्वयं को इस मिट्टी के साथ एकाकार कर लेते हैं, तब हमें समझ आता है कि जिस प्रकार विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों को पनपने के लिए अलग-अलग प्रकार की मिट्टी की आवश्यकता होती है उस प्रकार हम सब भी अपनी-अपनी प्रवृत्तियों की मिट्टी से बने अद्वितीय रचनाएं हैं। इस बोध के आते ही दूसरों से तुलना और प्रतिस्पर्धा की दीवारें ढह जाती हैं। तब हम मुखौटों का भारीपन छोड़कर अपनी मौलिक विनम्रता में लौट आते हैं।
अपने इस अहंकार का वह विनाश ही वास्तविक जीवन का निर्माण है। जिस दिन हम अपनी गढ़ी हुई छवियों को जलाकर भस्म कर देंगे, उसी दिन हम उस निराकार महादेव से मिल पाएंगे जो हमारे भीतर के शून्य में विराजमान हैं। यह यात्रा किसी और की ओर नहीं, बल्कि 'स्वयं' से शुरू होकर 'स्वयं' तक पहुँचने की है—जहाँ न कोई मुखौटा है, न कोई बोझ, केवल अनंत शांति है।
माटी मिल गई माटी से , बंधन का भ्रम टूट गया
अहंकार जब भस्म हुआ, मैं ही निराकार हुआ।।
"शुभकामनाओं सहित,
रेखा विनीत
०८.०२.२०२५
About the Competition
The Global Poetry and Creative Writing Competition 2026 by Hashtag Kalakar is a prestigious platform celebrating diverse voices in poetry and creative writing. This annual competition invites participants worldwide to showcase their literary talents, offering a unique opportunity to engage with global themes and narratives. Participants explore various genres, contributing to a rich tapestry of cultural and creative expression.
We extend our heartfelt thanks to Rekha Vinit Jindal for her compelling essay, "यात्रा- अहंकार से निराकार तक," submitted to the Global Poetry and Creative Writing Competition 2026. Her work invites reflection on profound themes, and we appreciate her contribution to this global literary conversation.
About Hashtag Kalakar
Hashtag Kalakar is a creative platform dedicated to providing artists, writers, singers and other creative talents with opportunities to showcase their work and reach wider audiences through competitions, features and creative initiatives.


Comments