यह खांसी क्या आती है
By Abhishek Sharma
मन की तृप्ति के लिए कुछ यूँ मैं काम कर रहा,
बैठ अकेले कमरे में, मैं कुछ मनगढ़ंत किस्सा बुन रहा,,
जखड़ा है तुम्हारी यादों ने फिर, फिर फैली है खुशबू अलकों की,
नशा सा चढ़ रहा मुझ पर जैसे पिलाई हो हाला तुमने नयनों की,,
मच रहा उत्पात हृदय में, धधक उठा है ज्वाला,
तुम्हारी यादों का कालचक्र, भला कैसे रुकने वाला,,
मिलन अल्प समय का था , बिछोह ही अब रहने वाला,
चातक सा बाट जोहता, तुम्हारी यादों में मन होता मतवाला,,
आकर फिर चहका दो चिड़िया मन को, महका दो जीवित बागान मेरे,
समेटो मेरा बिख़रा जीवन, रुमाल नहीं हाथो से पोंछो अश्क मेरे,,
अवगुंठन कर दो अपनी बाहों में मुझको,
दे दो मेरे हिस्से का प्यार, बना लो ना अपना मुझको,,
यह कपोल कल्पनाएँ मेरी, कितनी सुन्दर लगती हैं,
देखता हूँ जब तुम्हारे साथ, ज़िंदगी कितनी हसीन लगती है,,
यह खांसी क्या आती है, सब नष्ट कर जाती है,
तुम्हारे साथ वाली यादों का सुख, चैन, आनंद छीन जाती है,,
सुना कमरा वीरान ज़िंदगी अकेला मैं, मेरी कष्ट, पीड़ा सब याद दिला जाती है,
यह खांसी भी कातिल है, मेरे पल दो पल की खुशियों का गला घोंट जाती है।
By Abhishek Sharma

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