यथार्थवादी कल्पना
By Harshvardhan Tyagi
मस्तिष्क में आधिपत्य, बदन पर वस्त्र खादी है,
मेरी पुस्तकों में, कल्पना भी यथार्थ वादी है.
यहां लत बुढ़ापे की लग गई है यौवन को,
परन्तु नई पीढ़ी इन्हीं वस्तुओ की आदी है.
हाट सी लगी है भावनाओ की हर जगह,
जिस तरह बिक सके बेच दो, मुनादी है.
उलझे पड़े हैं अभी जो स्वयं के चक्रव्यूह में,
उन्होंने हमारी हर एक पहेली सुलझा दी है.
मुद्दा बेरोजगारी का है ही नहीं कहीं पर,
देखिए, ये तो एक मनगढ़ंत आबादी है.
प्रेम की धूप से सेक कर हृदय के सूरज को,
अंधे ने अंधे को उजाले की लौ दिखा दी है.
By Harshvardhan Tyagi

Comments