मज़दूर
By PRATEEK SAINI
शहरों वाली इस शाम से ऊबे हुऐ
गांव के चौपालों की रात याद करते हैं
ऊंची ईमारतों से झांकती आंखों में
वो छोटे मकानों की कच्ची नींव देखते हैं
खामोश चहरों की चुप्पी तोड़ने की ज़रूरत है
ऐ दोस्त तुझे कुछ बोलने की ज़रूरत है
तेरे आस पास की वीरानी एक जंजीर है
तू जानता है तेरी कहानी बड़ी गंभीर है
एक अरसा गुमनामी में ज़िंदगी बिताई है
कौन जाने शहरों में तूने कितनी ठोकर खाई हैं
मन कचोट कर रोते भूखे बच्चों को सुलाया है
तूने बाप के किरदार में भी खुद को मज़दूर ही पाया है
कोने में फटी पड़ी है ज़िंदगी उसे सीने की ज़रूरत है
तूझे एक रात सूकून से सोने की ज़रूरत है
गुज़रती गाड़ियों को सपने में सजाके रखता है
गरीब है जनाब हर चीज़ का हिसाब रखता है
झुर्रियों को दर्द की किताब बनने की ज़रूरत है
ऐ दोस्त तुझे एक बार खुलके हंसने की ज़रूरत है
ऐ दोस्त तुझे एक बार खुलके हंसने की ज़रूरत है
By PRATEEK SAINI

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