मोह पाश
By Parul Bhargava
प्रज्वलित हो उठते हैं असंख्य दीपक
मेरे मन की परिकल्पनाओं में
जब कभी घण्टियों के स्वरों से
गुंजायमान होते हैं देवालय
तेरे शब्द प्रतिध्वनित हो...
पुकारते हैं मुझे ,
मैं मोहपाश में बँधी...
दौड़ पड़ती हूँ उसी पगडंडी पर
उल्लासित मन में कई स्वपन लिये...
उस क्षण भूल कर तेरे विछोह की वेदना
नदी तट पर करती हूँ तेरी प्रतीक्षा
आत्ममुग्धा सी मैं ,जल प्रतिबम्ब देख
लजा सी जाती हूँ....
हृदयस्पन्दन का शोर
बढ़ा देता है पुनःमिलन की कामना
हर दिन ऐसे ही अपलक मेरे नयन
सुबह की लालिमा से साँझ की नीलिमा तक
तेरा पथ रहते हैं निहार
"शायद फिर इक झलक जो तेरी पा जाऊँ
मैं सिर्फ और सिर्फ तेरी हो जाऊँ"।।
By Parul Bhargava

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