मैंनें ख़त लिखा है
By Sneha Kumari
कि शायद जो अल्फाज़
ज़ुबां की राह भूले हैं
वो स्याही से उतर आए,
खुलें जब काग़ज़ की सिलवटें
वो तुम्हें बिन पढ़ें ही समझ आए।
मैंनें ख़त लिखा है
कि माथे की शिकन
शब्दों का ताज बनें
और दिल में उतर जाए,
काग़ज़ की खाली जगहें भी
तुम्हारे जवाबों से भर जाए।
मैंनें ख़त लिखा है
कि जो बातें सन्नाटे की
चादर में लिपटी हैं
वे भी नग्न नज़र आए,
और जिन एहसासों का जिक्र हुआ ही नहीं
मेरी लिखावट में वो राज़ तुम्हें समझ आए।
मैंनें ख़त लिखा है
कि जो बातों को दिल की
दराजों में एक अरसे से बंद थी
तुम्हें उन दराजों की चाभी मिल जाए,
और रखें थे जो ख्वाब एशर्टे में बुझा कर
तुम्हें उनकी मंद सुलगन तपा जाए।
मैंनें ख़त लिखा है
कि शायद अब रंजिश की
बेड़ियों में कैद सभी
आरज़ू लिफ़ाफे में ही आज़ाद हो जाए,
और बांधे रखी थी जो दुप्पटे की गांठ में
वो चाहत तुम को तड़पा जाए।
मैंनें ख़त लिखा है तुम्हें
क्योंकि अल्फाजों में अब वो
एहसासों का स्वाद नहीं,
बोल दूं हर राज़ तुम्हें
अब इस रिश्ते में वो विश्वास नहीं।
मैंनें ख़त लिखा है तुम्हें
कि अब इस काग़ज़ और स्याही ने
मुझे क्षण भर में आज़ाद किया है,
और छुपाए थे जो राज़ तुम से, उन्हें भी
हल्की धुंधली स्याही में आबाद किया है।
कही थी जो बातें सभी
बस उन्हीं को सरेआम किया है,
हां बड़े अरसे के बाद
मैंनेंख़तलिखाहै।
By Sneha Kumari

Comments