मैंने उसे कहा..
By Kavayanjali Uttam Uppalwad
मैं उससे प्रेम करती थी, वो किसी और का फ़साना था,
मैंने चाहा उसे रोशनी समझ, पर वो परछाई का दिवाना था।
मैंने हर दुआ में उसका नाम बुना,
पर वो किसी और की तक़दीर में लिखा था।
मैंने उसे सांसों में गूंथा, धड़कनों में सजाया,
पर उसकी धड़कनें किसी और की धुन पे थिरकती रहीं।
मैं समंदर बनी, उसकी लहरों से मिलने को बेताब,
पर वो किनारों की कैद में ही बहता रहा।
"वो मेरी पहली मोहब्बत था, लेकिन मैं उसकी नहीं..."
मैंने चाहा उसे मुकम्मल करना,
पर उसकी कहानी पहले ही लिखी जा चुकी थी।
वो जिस मोड़ पर मुझसे मिला,
वहाँ उसकी यादों की चादर बिछी पड़ी थी।
कैसी होगी वो, जो उसकी सुबहों की पहली दुआ थी?
जिसकी हँसी उसके अधूरे गीत की धुन थी?
जिसका नाम अब भी उसकी तन्हाइयों में गूंजता होगा,
और मैं? बस एक गुज़रती हुई हवा थी।
मगर क़सूर उसका भी नहीं था,
इश्क़ ज़ोर से खटखटाने से दरवाज़ा नहीं खोलता,
जो पहली बार दिल में घर कर जाए,
वो अक्सर हमेशा वहीं रहता हैl
और जब जुदा होना पड़ा,
शब्द तीर बने, खामोशियाँ सैलाब।
"तूने कभी समझा ही नहीं!" मैंने चिल्लाकर कहा,
"और मैं चाहकर भी तुझे समझा नहीं सका!" उसने जवाब दिया।
दो रूहें, जो एक-दूजे की थीं,
वक़्त की आँधियों में बह गईं।
अब न सवाल उठते हैं, न लफ़्ज़ बिखरते हैं,
न चीखती है, न लड़ती है, बस ख़ामोश रहती है।
सांसें चलती हैं पर कोई हलचल नहीं,
शायद अब दिल भी पत्थर सा हो गया है कहीं।
By Kavayanjali Uttam Uppalwad

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