मैं हूँ (I Am)
By Astha Priyadarshini
मैं ही मंदिर, मस्जिद भी मैं हूँ,
जो कर सको शुक्र अदा, तो सदका भी मैं हूँ,
मैं ही नमाज़, और मंत्र भी मैं हूँ,
जो इबादत करो, तो आराधना भी मैं हूँ।
मैं ही बेपरवाह, आतंकित भी मैं हूँ,
मैं ही अल्पसंख्यक, और बहुमत भी मैं हूँ,
जो तोड़ सके सत्ता के ज़ंजीरों को, वो मालिक भी मैं हूँ,
हुकूमत को उसकी हैसियत दिखाने का, सामंजस्य भी मैं हूँ।
मैं ही दर्द, दवा भी मैं हूँ,
मैं ही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में फिरता,
धर्म का बीमार भी मैं हूँ,
मैं ही प्रार्थी, और अपराधी भी मैं हूँ।
मैं ही हारा हुआ, बेरोज़गार भी मैं हूँ,
बंगलों में भी मैं हूँ, मकानों में भी मैं हूँ,
जो तोड़ सके तख़्त की दीवार को, वो ताक़त भी मैं हूँ,
तुम्हारे द्वंद्वों में छिपा, सच का आइना भी मैं हूँ।
मैं ही गलियों में फिरता, बदनाम-मजबूर भी मैं हूँ
मैं ही जो लड़ता हूँ, और हारता भी हूँ,
इस हकीक़त से जूझता, भीड़ का हिस्सा भी मैं हूँ,
के जो मान सको, तो खुदा भी मैं हूं।
सरहदों में बटी इस दुनिया में,
इंसानी लहू का रंग भी मैं ही हूँ,
गोरों-कालों में फ़र्क़ करती इस दुनिया में,
माटी का बदलता रंग भी मैं हूं।
मैं ही सीने की दर्द, मन का अंगार भी मैं हूँ,
जो खुद पे यक़ीन हो सके तो, आत्मा की बुलंद आवाज़ भी मैं हूँ,
मैं ही मंदिर, मस्जिद भी मैं हूँ,
जो कर सको शुक्र अदा, तो सदका भी मैं हूँ।
मैं ही तुम्हारा ज़मीर, और साहस भी मैं हूँ,
मैं ही तो उठा हूँ तुम्हें तुमसे मिलाने,
मैं ही हूँ जो तुम्हारी कोशिशों में हूँ,
तुम्हारी फ़ितरत बन, तुम्हारे अंदाज़ों में भी मैं हूँ।
मैं ही उस दर्द का मलहम, राहत भी मैं हूँ,
के भाषा भी मैं हूँ, और भ्रांति भी मैं हूँ,
जो तिनके भर उम्मीद से पनपता, वो क्रांति भी मैं हूँ,
मैं ही मंदिर, मस्जिद भी मैं हूँ।
(मैं ही मंदिर, मस्जिद भी मैं हूँ,
जो कर सको शुक्र अदा, तो सदका भी मैं हूँ,
मैं ही नमाज़, और मंत्र भी मैं हूँ,
जो इबादत करो, तो आराधना भी मैं हूँ।)
By Astha Priyadarshini

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