मैं सही तो हूँ ना?
By Atisha Anil Dhotre
दुनिया क्या कहेगी,
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता।
पर कुछ करने से पहले,
दस बार पूछती हूँ ख़ुद से
मैं सही तो हूँ ना?
सबको मैं सुलझी हुई लगती हूँ,
पर भीतर ऐसी उलझनें हैं,
जिन्हें सुलझाना भी असंभव है।
मैं कैसी हूँ? क्या हूँ?
कोई और मुझसे पूछे,
उससे पहले ही मैं अपने आप से ये पूछ लेती हूँ।
हर बार एक नया सवाल होता है ज़हन में,
उसका जवाब भी दे देती हूँ।
फिर एक बार पूछ लेती हूं ख़ुद से
मैं सही तो हूँ ना?
किसी को चुना नहीं मैंने अपने ऊपर,
सब सवाल करते हैं “क्यों?”
जवाब किसी और को नहीं,
बल्कि खुद को दे देती हूँ।
पर उसी जवाब के साथ,
एक और सवाल, हमेशा की तरह
मैं सही तो हूँ ना?
मुझे पता है,
हर बार सही होना ज़रूरी नहीं।
हम इंसान हैं
कभी-कभी लिया हुआ फ़ैसला गलत भी हो सकता है।
पर फिर भी,
मेरे अंदर कई ऐसी "मैं" हैं
जो अपने हिसाब से नहीं,
दुनिया के हिसाब से सोचती हैं,
और फिर...
अपने आप पर संदेह कर पूछ ही लेती हैं,
मैं सही तो हूँ ना?
By Atisha Anil Dhotre

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