मैं लिखना चाहता हूँ
By Anant Srivastav
हाँ, मैं लिखना चाहता हूँ —
न प्रशंसा के लोभ में,
न यश की आकांक्षा में,
अपितु केवल इसलिए
कि शब्दों की धार
कभी-कभी तलवार से तीव्र हो जाती है।
बस लिख देना चाहता हूँ —
मन के उस कोने से
जहाँ आक्रोश है,
पर संयमित;
जहाँ वेदना है,
पर उद्देश्यपूर्ण।
यह जानकर कि शायद
आज न सुने कोई,
आज न पढ़े कोई,
पर समय की गर्द जब छंटेगी,
तो शायद कोई खोले यह पन्ना,
और उसमें ढूंढ ले
अपने प्रश्नों का उत्तर।
लिखना चाहता हूँ वह सत्य
जिसे चुप्पियों ने ढक रखा है,
वह अन्याय
जो वर्षों से व्यवस्था के आँगन में पलता रहा है।
मैं नहीं चाहता कोई पुरस्कार —
चाहता हूँ बस परिवर्तन की पहली चिंगारी बनना।
यदि मेरी लेखनी
किसी एक चेतना को भी झकझोर दे,
किसी एक हृदय में भी जगा दे प्रश्न,
तो समझूँगा —
मेरे शब्द व्यर्थ नहीं गए।
क्योंकि कभी-कभी
एक कविता
एक क्रांति का बीज होती है
कभी एक विचार
हिला देता है सम्राटों के सिंहासन।
हाँ, मैं लिखना चाहता हूँ —
इतिहास के लिए नहीं,
बल्कि भविष्य के लिए।
उन आँखों के लिए
जो आज बंद हैं, पर कल खुलेंगी।
उन स्वरों के लिए
जो आज मौन हैं, पर कल गरजेंगे।
बस लिख देना चाहता हूँ,
शब्दों से नहीं,
संकल्प से —
कि मेरा लेखन
कभी किसी परिवर्तन का प्रारंभ बन सके।
By Anant Srivastav

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