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मैं, लकड़ी

Feb 13, 2023
3 min read

By Akshar Tekchandani


मैं लकड़ी, हर घर को हूँ जानती,

शयन कक्ष से आँगन तक;

कोना-कोना हूँ पहचानती |


मेरे अंग, गुड्डू से दादी तक,

सबके जीवन का हिस्सा हैं;

और जुड़ा मेरे हर हिस्से से

इक प्यारा सा किस्सा है |


नवजात गुड़िया जब दूध पी कर,

अलसाती है अपने पालने में;

तो उसके मात-पिता के संग मेरा भी,

मानस लगा रहता उसे संभालने में |


जब गुड़िया को, उसका ख़ुशनसीब बाप,

पालना हिलाकर झूला झुलाता;

तो अपने ऊपर हँसती गुड़िया को देख,

मेरा ह्रदय भी फूला न समाता


बालक; दीपू, रामू, श्यामू, गुल्लू,

जब उठाते अपने पहले बल्ले;

तब उन्हें सीखते, जीतते पाकर,

मेरा बैट-रूप हो बल्ले-बल्ले;

और धीरे-धीरे, चौके-छक्के पड़ते,

गाँव-शहर, हर गली-मोहल्ले |


गंभीर अनुज जब विद्यालय में,

क़लम पकड़ता कक्षा में;

तब कठिन प्रश्न के वार समक्ष,

रहती तैनात मैं रक्षा में |


परीक्षा पूर्व जब रात को,

पढ़ते-पढ़ते मेज़ पर सो जाता;

तब मेरा मन माँ जैसे,

उसपे हस्त फहराने को ललचाता;

पर मैं लकड़ी, बेजान-लाचार,

उठकर उस तक पहुँच न पाती;

तब अपनी वर्षों की,

सकारात्मकता से उसके,

मन को ठंडक,

व मानस,

को ढ़ांडस,

दे जाती |

तभी तो बच्चों,

मेज़ पर,

रख सर,

है नींद इतनी अच्छी आती |


खिड़की के सिल पर

कुहनी इक रख कर,

पल-पल गिन-गिन कर

है नव-वधु,

गली के मोड़ पर

एकटक नज़र लगाए;

कि उसके पिया

संग लिए जिया,

आखिर कब घर आएं ?


आखिर आता है एक चेहरा

डाकिया का, लाया है संदेश,

पिया का

एक लंबी-सी चिट्ठी में,

कुछ दिन और परे रहेंगे

वो चौखट की मिट्टी से;


उसके विरह में छलकते अश्रु को,

मैं, सिल की लकड़ी, सोख लेती हूँ;

कहीं बह न जाए वो कीमती पानी

पिया के नाम का मोती,

जिसके गिरने से है वो अनजानी;

दुनिया में खो जाने से

मैं, सिल की लकड़ी, रोक लेती हूँ;

छलकते अश्रुओं को,

मैं सोख लेती हूँ |



बड़ी भाभी का तो मुझसे बहुत,

गहरा-पुराना रिश्ता है;

मुझ बेलन और चकले के बीच,

आटा बिलता-पिसता है |


बालपन में, बन पालना

तो बनकर कभी बल्ला,

बच्चों को खूब प्यार जताती हूँ;

पर भाभी जब गुस्से में आएं,

तो उनके हाथ का बन-बेलन,

उन्हीं बच्चों को डराती हूँ |


जब भाभी कपड़े धोतीं तो

उनके हाथ में पीटना बन,

नाज़ुक वस्त्रों को हूँ दर्द पहुँचाती;

पर पीट-पीट कर आखिर में,

उनको पूर्णतः हूँ चमकाती |


दादी की मैं हूँ सबहुं में प्यारी, क्योंकि,

प्रातः काल में लेकर चंदन

करतीं दादी ईश्वर वंदन |


चंदन-रूप को जब घिस-घिस के,

कल-कल छल-छल बहते जल से;

स्नान करा कर,

स्पर्ष करा कर;

करतीं दादी पूर्ण श्रद्धा से,

ईश्वर का प्रतिमा-अभिशेक;

मुझे लगे मैं फिर से उस,

सृष्टिकर्ता संग हो गयी एक |


कई रूप हैं मेरे;

अनेक स्वरूप हैं मेरे |

गुड़िया का पालना,

तो भाभी का बेलन;

पूजा की ज़रुरत,

तो अनुज की क़लम;

बच्चों का बल्ला,

तो इन सबका शयन |


परंतु;

आनंदित हो उठतीं हूँ सर्वाधिक

जब थके-मांदों को मुझमें,

जगह देता है नाविक;


या जब;

जग से छुपाकर अपनी कमाई

ग़रीब नौकरानी,

मुझ-डब्बे को सौंपती;

रखने को निगरानी |


व जब;

किसी विकलांग की बनती मैं बैसाख़ी,

या बनती किसी अंधे-बुज़ुर्ग की लाठी;

कई रूप-अनेक स्वरूप, संसार में,

मिलेगी मेरी हर कद-काठी |


अंततः

मरती हूँ मैं

रोती हूँ मैं,

होती मेरी जब अत्यधिक मांग;

कैसा भी कद ! कैसी भी काठी !

तब मैं बूझती, यह न है कोई विकलांग;

बल्कि अब मेरे सबसे,

कठिन फ़र्ज़ की घड़ी है;

किसी अभागे आँगन में,

मृत्य दस्तक दिए खड़ी है |


जिस मनुष्य का पालना बनी

खिलौना बनी,

और बनी जिसकी स्लेट;

जिसपे, कभी बैठ, तो कभी लेट;

वो बनाता- अक्षर, जानवर, माता, पिता,

आज उसकी निर्जीव देह की,

बनने जा रही मैं चिता;

बस इसी लिये,

मरती हूँ मैं,

रोती हूँ मैं,

जलती हूँ मैं,

तब सिरे से अंत तक,

मचलती हूँ मैं |


इंसान की आत्मा शरीर छोड़,

पर्मात्मा से मिल जाती;

जल-राख़-बन मैं लकड़ी,

भूमि से फिर घुल-मिल जाती |


पर यह ज़िम्मेदारी तो अटल है, क्योंकि,

अटूट है यमलोक की प्रवेश श्रृंखला;

रोज़ अनेक प्राणीओं को मैं,

इहलोक से परलोक का मार्ग रही हूँ दिखला |


वैसे तो मेरा नाता तो इनसे, युगों पुराना है,

पर पिछले कुछ दशकों से, हैरान हूँ मैं खुद;

की मनुष्य जब भी सफ़लता, किस्मत में ढूंढे,

तो बड़ी मिठास से, है कह देता है- “Touchwood” ||


By Akshar Tekchandani





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