मैं, लकड़ी
By Akshar Tekchandani
मैं लकड़ी, हर घर को हूँ जानती,
शयन कक्ष से आँगन तक;
कोना-कोना हूँ पहचानती |
मेरे अंग, गुड्डू से दादी तक,
सबके जीवन का हिस्सा हैं;
और जुड़ा मेरे हर हिस्से से
इक प्यारा सा किस्सा है |
नवजात गुड़िया जब दूध पी कर,
अलसाती है अपने पालने में;
तो उसके मात-पिता के संग मेरा भी,
मानस लगा रहता उसे संभालने में |
जब गुड़िया को, उसका ख़ुशनसीब बाप,
पालना हिलाकर झूला झुलाता;
तो अपने ऊपर हँसती गुड़िया को देख,
मेरा ह्रदय भी फूला न समाता
बालक; दीपू, रामू, श्यामू, गुल्लू,
जब उठाते अपने पहले बल्ले;
तब उन्हें सीखते, जीतते पाकर,
मेरा बैट-रूप हो बल्ले-बल्ले;
और धीरे-धीरे, चौके-छक्के पड़ते,
गाँव-शहर, हर गली-मोहल्ले |
गंभीर अनुज जब विद्यालय में,
क़लम पकड़ता कक्षा में;
तब कठिन प्रश्न के वार समक्ष,
रहती तैनात मैं रक्षा में |
परीक्षा पूर्व जब रात को,
पढ़ते-पढ़ते मेज़ पर सो जाता;
तब मेरा मन माँ जैसे,
उसपे हस्त फहराने को ललचाता;
पर मैं लकड़ी, बेजान-लाचार,
उठकर उस तक पहुँच न पाती;
तब अपनी वर्षों की,
सकारात्मकता से उसके,
मन को ठंडक,
व मानस,
को ढ़ांडस,
दे जाती |
तभी तो बच्चों,
मेज़ पर,
रख सर,
है नींद इतनी अच्छी आती |
खिड़की के सिल पर
कुहनी इक रख कर,
पल-पल गिन-गिन कर
है नव-वधु,
गली के मोड़ पर
एकटक नज़र लगाए;
कि उसके पिया
संग लिए जिया,
आखिर कब घर आएं ?
आखिर आता है एक चेहरा
डाकिया का, लाया है संदेश,
पिया का
एक लंबी-सी चिट्ठी में,
कुछ दिन और परे रहेंगे
वो चौखट की मिट्टी से;
उसके विरह में छलकते अश्रु को,
मैं, सिल की लकड़ी, सोख लेती हूँ;
कहीं बह न जाए वो कीमती पानी
पिया के नाम का मोती,
जिसके गिरने से है वो अनजानी;
दुनिया में खो जाने से
मैं, सिल की लकड़ी, रोक लेती हूँ;
छलकते अश्रुओं को,
मैं सोख लेती हूँ |
बड़ी भाभी का तो मुझसे बहुत,
गहरा-पुराना रिश्ता है;
मुझ बेलन और चकले के बीच,
आटा बिलता-पिसता है |
बालपन में, बन पालना
तो बनकर कभी बल्ला,
बच्चों को खूब प्यार जताती हूँ;
पर भाभी जब गुस्से में आएं,
तो उनके हाथ का बन-बेलन,
उन्हीं बच्चों को डराती हूँ |
जब भाभी कपड़े धोतीं तो
उनके हाथ में पीटना बन,
नाज़ुक वस्त्रों को हूँ दर्द पहुँचाती;
पर पीट-पीट कर आखिर में,
उनको पूर्णतः हूँ चमकाती |
दादी की मैं हूँ सबहुं में प्यारी, क्योंकि,
प्रातः काल में लेकर चंदन
करतीं दादी ईश्वर वंदन |
चंदन-रूप को जब घिस-घिस के,
कल-कल छल-छल बहते जल से;
स्नान करा कर,
स्पर्ष करा कर;
करतीं दादी पूर्ण श्रद्धा से,
ईश्वर का प्रतिमा-अभिशेक;
मुझे लगे मैं फिर से उस,
सृष्टिकर्ता संग हो गयी एक |
कई रूप हैं मेरे;
अनेक स्वरूप हैं मेरे |
गुड़िया का पालना,
तो भाभी का बेलन;
पूजा की ज़रुरत,
तो अनुज की क़लम;
बच्चों का बल्ला,
तो इन सबका शयन |
परंतु;
आनंदित हो उठतीं हूँ सर्वाधिक
जब थके-मांदों को मुझमें,
जगह देता है नाविक;
या जब;
जग से छुपाकर अपनी कमाई
ग़रीब नौकरानी,
मुझ-डब्बे को सौंपती;
रखने को निगरानी |
व जब;
किसी विकलांग की बनती मैं बैसाख़ी,
या बनती किसी अंधे-बुज़ुर्ग की लाठी;
कई रूप-अनेक स्वरूप, संसार में,
मिलेगी मेरी हर कद-काठी |
अंततः
मरती हूँ मैं
रोती हूँ मैं,
होती मेरी जब अत्यधिक मांग;
कैसा भी कद ! कैसी भी काठी !
तब मैं बूझती, यह न है कोई विकलांग;
बल्कि अब मेरे सबसे,
कठिन फ़र्ज़ की घड़ी है;
किसी अभागे आँगन में,
मृत्य दस्तक दिए खड़ी है |
जिस मनुष्य का पालना बनी
खिलौना बनी,
और बनी जिसकी स्लेट;
जिसपे, कभी बैठ, तो कभी लेट;
वो बनाता- अक्षर, जानवर, माता, पिता,
आज उसकी निर्जीव देह की,
बनने जा रही मैं चिता;
बस इसी लिये,
मरती हूँ मैं,
रोती हूँ मैं,
जलती हूँ मैं,
तब सिरे से अंत तक,
मचलती हूँ मैं |
इंसान की आत्मा शरीर छोड़,
पर्मात्मा से मिल जाती;
जल-राख़-बन मैं लकड़ी,
भूमि से फिर घुल-मिल जाती |
पर यह ज़िम्मेदारी तो अटल है, क्योंकि,
अटूट है यमलोक की प्रवेश श्रृंखला;
रोज़ अनेक प्राणीओं को मैं,
इहलोक से परलोक का मार्ग रही हूँ दिखला |
वैसे तो मेरा नाता तो इनसे, युगों पुराना है,
पर पिछले कुछ दशकों से, हैरान हूँ मैं खुद;
की मनुष्य जब भी सफ़लता, किस्मत में ढूंढे,
तो बड़ी मिठास से, है कह देता है- “Touchwood” ||
By Akshar Tekchandani

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