मैं बहलाता रहा ख़ुद को हमेशा इस कहानी से (ग़ज़ल)
By Ananth
मैं बहलाता रहा ख़ुद को हमेशा इस कहानी से
नयी तस्वीर को बेहतर बनाऊँगा पुरानी से।
मदारी जिसको समझे सब वो ख़ुद भी इक झमूरा है
मगर वादे वो करता है तो अब भी आसमानी से।
मोहब्बत ज़ुल्म ना बन जाए हमको ड़र सा लगता है
हुए बर्बाद हैं पौधे ज़ियादा धूप पानी से।
ना मैंने जिस्म था माँगा ना मैंने जान माँगी थी
बड़ी उम्मीद मत रखना कोई मेरी जवानी से।
ज़ुबान-ए-ख़ामुशी मुझको समझ आने लगी इतनी
कमा लेता हूँ मैं रोटी इसी की तर्जुमानी से।
By Ananth

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