मैं बनारसिया
By Akarshan Agrawal
इतिहास में बुने भारत का थान, सदियों युगो का यह साक्ष्य ज्ञान ,
वस्त्रों में सबसे सर्वमान्य,
ना बिजली थी ना कोरोशिया ,
करघे में बुनकर मै बनी बनारसिया ।।
वेदों में वर्णित हिरण्य्या ,
काशी कुमारी का अभिमान मै ,
कान्हा के हस्त कमलों से निकली-
पांचाली की हूं लाज मै
विश्वओके हैं जो विश्वनाथ -
उस नाथ की पहचान मै ,
ना टीवी थी ना मीडिया -
सुंदरता से प्रचलित मैं बनी बनारसिया,।।
स्त्रियों का श्रृंगार हूँ -
राजाओं का सम्मान मै,
जब लाल होता रंग मेरा -
ब्याहता का हूं सौभाग्य मै,
गंगा की धार सी मैं बहीं -
कई धाराओं की जननी हू -
है नाम अलग पर काम एक ,
ना प्लास्टिक था ना विस्कोसिया -
सोने और रेशम से बुनी मैं बनारसिया ।।
अब कई कपड़ों में मिलती हूं -
कहीं सूट तो कहीं साड़ी बनकर बिकती हूं ,
जो जीव नहीं आगे होंगे-
वह पक्षी मुझ पर नक्श है ,
प्रकृति के रंगों से थी बनी -
अब "केमिकल" से जंग है ,
जो भी हो जैसा भी हो मेरी मूल पहचान एक है ,
जैसे राधा में रंगे रसिया-
गंगा के पानी से रंगी मै बनारसिया ।।
एक एक धागे में बटे हुए-
उस बुनकर की अभिलाषा हूं,
जिन हाथों ने दिया जन्म मुझे-
उसके जीवन की आशा हूं ,
कभी वह मुझसे बातें करता था-
कभी मैं उसके मन को पढ़ती थी ,
जो लाड प्यार वह देता था -
मैं उसे हमेशा रखती थी ,
ताकि जब कोई लिपटे मुझ में -
मैं उसे खुशी के क्षण दे दूं ,
जब जब वह चूमे मुझको -
होठों पर हंसी के रस भर दूं,
जैसे आसमान में प्यारी लगे गौरैया-
वैसे मैं मेरे बुनकर की बनारसिया।।
अब
ना हाथ रहे मेरे बुनकर के-
मैं प्यार कहां से लाऊंगी,
इन मशीनों में बनती हूं अब-
सिर्फ दुख और मतलब दे पाऊंगी ,
जब तक बुनकर के हाथ में थी -
हीरे जैसी थी कदर मेरी ,
अब मशीनों में झट-झट बनती हूं-
रुपयों का भी कोई मूल्य नहीं ,
हे नाथ मुझे बुनकर दे दे -
जो खुशी से गूथे मेरी रस्सियां,
'ब' से ही होता है बुनकर-
मैं 'ब'से बुनकर की बनारसिया ।।
By Akarshan Agrawal

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