मैं नोट हूँ
By Chandra Kant Mishra
कितना भी हूँ फटेहाल मैं नोट हूँ, निराली मेरी चाल निकल जाऊँ जो बाज़ार में उमर बढ़ जाती मेरी सालों-साल। मेरे लिए ही तो हैं संसार के सारे मायाजाल मेरे लिए ही तो हैं इस जगत में सब बेहाल।
कृपा-दृष्टि मेरी पड़ जाए दीन भी हो जाते मालामाल वक्र-दृष्टि मेरी पड़ते ही नृप भी बन जाते कंगाल। जब तक रहे सान्निध्य हमारा सगे-सम्बन्धी पूछते हाल मैं ही कलियुग का भाग्यविधाता मेरे बिन अब नहीं बनते गुदरी के लाल।
By Chandra Kant Mishra

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