मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।
By Budhraj Singh Khinchi
क्या तुमने जिम्मेदारी ली?
इस विकृत होते मानव समाज की।
भयावह भविष्य और घिनौने आज की।
क्या तुमने जिम्मेदारी ली?
ये जो निर्भया, आसिफ़ा, ट्विंकल, प्रियंका
और इनके जैसी अनगिनत लड़कियाँ। कौन हैं?
ये और कोई नहीं बेटियाँ है तुम्हारी।
तुम देख नहीं पा रहे शायद लेकिन मुझे दिखता है जल्दी ही आ रही है तुम्हारी भी बारी।
अरे! साहब क्या हुआ? आप तो तिलमिला गए! बुरा लगा? अभी तो ये कल्पना है सारी।
लेकिन ग़र जिम्मेदारी नहीं ली तो ये सिहरा देने वाली कल्पना, सच हो जाएगी सारी।
अब आप सफाई दोगे, मैं कैसे जिम्मेदार हूँ?
मैंने क्या किया है? आख़िर मैं कैसे गुनाहगार हूँ।
तो ग़ौर से सुनो।
और अक़्ल हो तो गुनो।
एक किसान के खेत में फसल की जगह उग आए खरपतवार के लिए किसे जिम्मेदार कहोगे?
जो जीवनदाता अन्न की जगह ज़हरीले बीज बो दे आख़िर उसे नहीं तो किसे गुनहगार कहोगे?
जिम्मेदारी लो क्योंकि ये समाज तुमसे भी बना है, तुम भी इसकी एक इकाई हो।
मेरी बात की संज़ीदगी को ग़र आज टाल गए तो याद रखो तुम भी एक कसाई हो।
जिम्मेदारी लो क्योंकि इन खरपतवारों को पड़ोसी के खेत में उगते देख तुमने नज़रअंदाज़ किया है।
खेत पड़ोसी का है मुझे क्या फ़र्क पड़ता है? इस सोच ने ही इस सारी बर्बादी का आगाज़ किया है।
जिम्मेदारी लो क्योंकि प्रकीर्णन होगा और ये बीज तुम्हारे खेत में भी उगेंगे ज़रूर।
जिम्मेदारी लो क्योंकि संगति का असर एक ना एक दिन पड़ता है ज़रूर।
बचपन मे पढ़ा था सड़े सेव के सम्पर्क से स्वस्थ सेव भी सड़ जाता है।
घिनौना हो जाता है वो भी जो घिनौनी संगति में पड़ जाता है।
पड़ोसी के घर की आग से पता नहीं चलता कब अपना घर भी जल जाता है।
पड़ोसी के घर मे लगी आग को बुझाने वाला ही आखिरकार अपना घर बचा पाता है।
मैं कहता हूँ तुम भी जिम्मेदार हो इस हैवानियत के।
मैं कहता हूँ, हाँ तुम भी क़ातिल हो इन्सानियत के।
कभी पता लगाया, क्यो?
कुछ समझ आया, क्यों?
क्योंकि पतित हो चुकी सामाजिक व्यवस्था में तुम कभी अपनी औकात नहीं देखते हो।
लेकिन इन वहशी दरिन्दों में भी तुम अपना धर्म देख लेते हो, अपनी जात देख लेते हो।
हमारी मनुष्यता को धिक्कार है।
दानवों के लिए मानवाधिकार है।
बन्द करो ये मोमबत्तियाँ जलाना।
बन्द करो ये घड़ियाली आँसू बहाना।
तुम्हें अभी बहुत सारे बलात्कारियों को विधान सभा भी तो पहुँचाना है।
तुम्हें अभी इन्हीं बलात्कारियों से बलात्कार के लिए कठोर क़ानून भी तो बनवाना है।
तुम्हें अभी बहुत सारे बलात्कारियों को संसद भी तो पहुँचाना है।
तुम्हें अभी अपने स्वार्थ के ढ़ेर सारे मक़सद भी तो पाना है।
तुम जिम्मेदारी नहीं लेते क्योंकि तुम पार्टियों के भक्त हो।
तुम जिम्मेदारी लोगे भी क्यों भला तुम तो सबसे विरक्त हो।
तुम्हारे नेता जो ख़ुद बलात्कारी हैं और बलात्कारियों के पैरोकार बने हैं। लेकिन तुम्हें क्या?
अक़्ल के अन्धों! ईश्वर और तुम्हारे बीच भी पाखण्डी धर्म के ठेकेदार बने हैं। लेकिन तुम्हें क्या?
तुम तो वहाँ भी अक़्ल की अन्धता में ख़ुद अपनी बेटियाँ परोस देते हो।
जब वो ही हवस के भूखे भेड़िये नोच डालते हैं उन्हें, फिर किसे दोष देते हो?
जिम्मेदार बनो क्योंकि ये समाज, ये दुनिया, ये जहान तुमने ही बनाया है।
जिम्मेदार बनो क्योंकि दरिन्दों को इतिहास में महान तुमने ही बनाया है।
जिम्मेदारी लो
क्योंकि सोशल मीडिया पर खुलेआम फ़ैली गन्दगी का तुम कभी विरोध नहीं करते।
तुम कहीं ना कहीं उस गन्दगी में रस लेते हो उसके खिलाफ़ कभी कोई प्रतिरोध नहीं करते।
जिम्मेदारी लो
सियासतदानों क्योंकि तुम सब धृतराष्ट्र बने सत्ता के मोह में जकड़े बैठे हो।
दुराचार फैल रहा है समाज में और तुम झूठे अहम में अकड़े बैठे हो।
ये सब हो रहा है क्योंकि तुम अपनी बारी आने तक इंतज़ार करते हो तबाही का।
ये सब हो रहा है क्योंकि तुम नज़रअन्दाज़ करते हो ये मंज़र मनुष्यता की बर्बादी का।
हो कहीं ज़मीर ज़िन्दा तो जिम्मेदारी लो दुनिया अपनी नज़रों से देखोगे।
फिर कभी किसी बलात्कारी कुत्ते को संसद विधानसभा नहीं भेजोगे।
जिम्मेदारी लो अपने डर का सामना करोगे।
कब तक लोकतंत्र के स्वामी होकर डरोगे?
ये पुलिस, ये नेता, ये प्रशासन नौकर है तुम्हारे।
तुम्हारी ही नहीं सुनते क्योंकि तुम डरे हुए हो सारे।
जिम्मेदारी नहीं लोगे तो ऐसा ही जहान पाओगे।
अपने ही बनाए नर्क से आख़िर कहाँ भाग पाओगे।
तुम लो ना लो मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।
मेरे होते ये अँधेरा है मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।
मैं जुगनू बनकर ही लड़ूँ चाहे, लेकिन इस अँधेरे से लड़ूँगा ज़रूर।
अकेला हूँ हार जाऊँ भले लेकिन अन्याय के खिलाफ़ अड़ूँगा ज़रूर।
मैं जिम्मेदारी लेता हूँ, मैं दोषी हूँ, शर्मिंदा हूँ।
मैं जिम्मेदारी लेता हूँ क्योंकि मैं अभी ज़िन्दा हूँ।
मैं जिम्मेदारी लेता हूँ इस नैतिक पतन का क्योंकि मेरा ज़मीर अभी भी ज़िन्दा है।
तुम रिश्ते निकालो उससे जात पाँत के, मेरे लिए वो फ़क़त एक वहशी दरिन्दा है।
मैं जिम्मेदारी लेता हूँ मैं अपने बेटे को स्त्रीत्व का सम्मान सिखाऊँगा।
मैं जिम्मेदारी लेता हूँ मैं अपने बेटे को प्रकृति के भेद की सुंदरता दिखाऊँगा।
मैं सिखाऊँगा उसे, मर्दानगी किसी के जिस्म को बलात कब्जाने में नहीं है।
मैं सिखाऊँगा उसे, मर्दानगी किसी की इच्छा का अतिक्रमण कर जाने में नहीं है।
मर्दानगी किसी के दिल में घर बनाने में है।
मर्दानगी ख़ुद किसी का हो जाने में है।
तुम मर्द हो तभी जब तुम्हारी उपस्थिति किसी को अभय कर पाए।
नामर्द हैं वो सारे जो किसी कमजोर के दिल में भय कर जाए।
तुम जिम्मेदारी लो ना लो मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।
क्योंकि मैं समस्याओं के समाधान में विश्वास करता हूँ।
तुम जिम्मेदारी लो ना लो मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।
क्योंकि मैं शिकायतों से नहीं दायित्वबोध से आस करता हूँ।
तुम जिम्मेदारी लो ना लो, मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।
By Budhraj Singh Khinchi

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