मैं चुप रह कर चिल्लाता हूँ
By Chandra Kant Mishra
मैं चुप रह कर चिल्लाता हूँ बहरों की शहर में आवाज़ लगाता हूँ करने को रूह-ए-चमन को रोशन अंधों को चिराग़ दिखाता हूँ।
मैं कलम से आग लगाता हूँ कागद को राख बनाता हूँ रूढ़ प्रथा के दीमक को अपने शब्दों से मार भगाता हूँ। मैं ग़दर की बिगुल बजाता हूँ जीवन-रण में, म्यान नहीं तलवारें चमकाता हूँ मायूस मन के बुझते दीए में उत्साह की लौ जलाता हूँ।
By Chandra Kant Mishra

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