मैं कौन हूँ
By Vishvadeep Jain
मैं कौन हु मै खुद ही नही खोज पाया
खुद से सवाल मैं कभी नही कर पाया
ढूंढा मैने बहुत तो बस मैंने एक इंसान पाया
वो इंसान जो चला जग के सहारे था ।।
मैं वो इंसान हु जो खुद ही नही बन पाया
बच्चे से बड़ा और बड़े से जवान मैं जी ही नही पाया
बच्चा बनके खूब खेला
पर पढ़ाई ने फिर खूब पेला
सपना क्रिकेटर का था पर बनके मैं इंजीनियर निकला
सोचा था की जवानी मैं मौज करूंगा
पर जवानी ने ऐसा सितम ढाया
की राय मांगने के दौर मैं मैंने खुद को अकेला पाया
मजे अपने छोड़ कर मैने जिम्मेदारी से हाथ मिलाया
और कहना तो नही चाहता
पर जवानी ने मुझको वक्त से पहले मैच्योर बनाया
और इन सभी कश्मकश मैं कभी मैं खुद ही नही बना पाया ।।
बचपन से जिद्दी मैं
जवानी मैं कुछ बोल ना पाया
जब देखा खुद को आईने मैं तो एक अनसुना इंसान पाया
ना अपने पापा को मैं सहारा दे पाया
ना ही उनसे कांधे पर शाबाशी ले पाया
ना उनसे ये कह पाया की अब आप आराम करो
मैं अब कमाने आया हु
और ना ही उनसे मिल पाया और ना ही साया आखिरी बन पाया
और इन सभी कश्मकश मैं कभी मैं खुद ही नही बना पाया ।।
आखिर मैं एक बात
जो भी आया जीवन मैं मैंने सहर्ष स्वीकारा
ठोकर ,प्यार दर्द ,सवाल
मैने सभी को एक स्तर तक संभाला
जिम्मेदारी , ज़िद ना होना इन्होंने मुझे काफी हद तक सवार
और आज मैं एक अच्छा इंसान बन पाया
पर फिर बात वोही
इन सभी कश्मकश मैं कभी मैं खुद ही नही बना पाया ।।
By Vishvadeep Jain

True wordsss👏👍
Very beautifully written