मैं और मेरी जिंदगी
Updated: Jul 25, 2025
By Rashmi Dadhich
मुझे हराने की जिद करती पर मैं उसकी मानती ही नहीं, पराजय कहते किसे हैं??? मैं पहचानती ही नहीं!!
तपते रेगिस्तान पर वह नंगे पैर चलाती है,
कदम कदम पर जिंदगी इम्तिहानों के जाल बिछाती है, कहीं पहचान न लूं मैं अपनी डगर,
काली आंधी बनकर आंखों पर छा जाती है,
पर इन कदमों को पता है मंजिल की डगर,
वो यह जानती ही नहीं,
मुझे हराने की जिद करती पर मैं उसकी मानती ही नहीं
अरमानों की गठरी ले भविष्य के गर्भ में तैरती हूँ,
जीवन पटल पर विश्वास के कसीदे उकेरती हूँ,
वोअचानक धागा खींचकर सब कुछ बिगाड़ती है,
उसे खुश करने की खातिर बस थोड़ी देर ठहरती हूँ,
बिगड़े को संवारना आता है मुझे,
मेरी किस्मत जानती ही नहीं,
मुझे हराने की जिद करती पर मैं उसकी मानती ही नहीं
छुपाती हथियार करती वार सोचती है मैं चिल्लाऊंगी, झल्लाऊंगी रो -रो कर अपना हाल दुनिया को बताऊंगी, नित नई मुसीबतों उलझनों गम के बादलों से घिरी, शायद इस बार घुटनों के बल बैठ हार मान जाऊंगी,
पर मैं वही कुंदन हूं जो तप कर ही निखरता है,
वो यह जानती ही नहीं,
मुझे हराने की जिद करती पर मैं उसकी मानती ही नहीं.
मुझे यकीन है जिंदगी तेरी सुनहरी किताब में,
एक किस्सा मेरा भी होगा,
लोगों के दिलों की जमीन पर,
कुछ बिस्सा मेरा भी होगा,
मुझ जैसा हमसफर तुझे मिलेगा कहां,
फिर नए लिबास में इंतजार तुझे मेरा भी होगा,
हर बार नाम बदलकर मैं ही तेरे पन्नों पर छप जाती हूं, पर तू पहचानती ही नहीं,
मुझे हराने की जिद करती पर मैं,
उसकी मानती ही नहीं,
पराजय कहते किसे हैं मैं पहचानती ही नहीं…
By Rashmi Dadhich

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