मैं एक बेटी का बाप हूँ
By Chandra Kant Mishra जब मेरे घर बेटी ने जन्म लिया, मन को एक डर ने घेर लिया। लोगों ने कहा लक्ष्मी आई है, साथ खुशियों की सौगात लाई है। साक्षात सरस्वती स्वरूप है, कड़कती सर्दियों में प्यारी धूप है।
रम्भा जैसी प्यारी है मूरत, परी जैसी कोमल और खूबसूरत। आँगन में खिलता गुलाब है, माँ-बाप के जीवन का ख़्वाब है। लोगों का आल्हाद चलता रहा, मैं भीतर ही भीतर डरता रहा। मन में एक सवाल था अपेक्षित, क्या मेरी बेटी है सुरक्षित ? आज इंसानियत शर्मसार है, बेटियों का हो रहा बलात्कार है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है ऐसी पौरुष पर धिक्कार है। कहीं निर्भया कहीं प्रियंका बेचारी है, जाने कल किस बेटी की बारी है। कर रहा इसी बात का संताप हूँ, डरता हूँ मैं एक बेटी का बाप हूँ।
By Chandra Kant Mishra

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