मैं इतनी भी अलग नहीं
By Manu Singh
मैं इतनी भी अलग नहीं
मैं भी एक मां की कोक में रही
मेरा भी खून लाल है
मेरा भी दिल साफ़ है
तो फिर क्यों मुझे धितकारते हो
क्यों मुझे गालियों से पुकारते हो
क्यों मुझे मेरी मर्ज़ी के बिना छूते हो
क्यों मुझे मारते और पीटते हो
और क्यों मुझे नीची नज़र से देखते हो
मुझे भी महसूस होता है
मुझे भी दर्द होता है
मैं भी रोती हूँ
रातों में सब याद करती हूँ
अकेलापन मेरा भी होता है
दिल मेरा भी टूटता है
और दुःख मुझे भी होता है
मगर फिर भी क्यों मुझे समझते नहीं हो
क्यों रहने को घर देते नहीं हो
क्यों मुझे जिस्म के धंधे में धकेलते हो
और क्यों मुझे भीख माँगने पर मजबूर करते हो
बचपन में ग़लत मेरे साथ भी हुआ
माँ बाप होते हुए भी अनाथ महसूस किया
अपने आप को खोया और नफ़रत भी किया
बलात्कार मेरा भी हुआ
फिर क्यों मुझे समान नहीं मानते हो
क्यों मुझे बीमार मानते हो
और क्यों मुझे ख़राब मानते हो
मैं भी कई रातें भूखी सोयी हूँ
यहाँ तक कि सड़कों पर भी सोयी हूँ
मेरे भी बच्चे है
मेरे भी अपने है
तो फिर क्यों मुझे सम्मान नहीं देते
फिर क्यों मुझे अपनाने से है डरते
माना मैंने अपनी ज़िंदगी अपने हाथों में ली है
माना मैंने समाज की नहीं सुनी है
माना मैंने अपने जैसे से ही प्यार किया है
माना मैं ना पुरुष हूँ ना महिला हूँ
मगर मैं इंसान तो हूँ।
By Manu Singh

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