मैं आई हूँ लौट के
By Sanidhya Kumar
अंधेरो मेछुपी जो येपरछाई है
नज़र कब कि सी को आयी है।
सोच कर मन उदास है
मौत मि ल जाए अब; येकै सा एहसास है।
शांत हँमैफ़ि ज़ा रो रही
बे ड़ि यो को समेट कर मौन हँमैसो गई।
लफो का सच अब सामनेआया है
चीख़ो को मेरी जब तुमनेदफनाया है।
जि स पर कि या चोट है
अ सि त पर वार घंघोर है।
साँसो का घड़ा फू ट गया
िजंदगी का साथ अब छूट गया।
तुमारे लि येमैलाश हँ
बोलो का मैनही सरफ़राज़ हँ।
देख कर तौला कद मेरा
अब मेरी हि मत भी नाप ले
हो खड़ी उठुंगी मै
कर पहार फि र तैयार मै।
नज़र नही आई परछॉई मेरी, पकाश को खीच लाऊं गी आँ ख बंद कर, मौन हो, तुम सब को मैदि खाऊं गी। जननी हँमैजीवन भी मैही
काली का रप लूया दुगारमैबन जाऊं गी
बे ड़ि यो को तोड़ कर, समाज को झकझोर कर मैआई हँलौट के ।
मैआई हँलौट के ।
मैआई हँलौट के ॥
By Sanidhya Kumar

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