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मैं अभी जिंदा हूं!

Mar 12, 2023
3 min read

By Dr Digvijay Jadhav


शीर्षक – “अजून मी जिवंत आहे!” (मराठी)

शीर्षक – “मैं अभी जिंदा हू!” (हिंदी)


( कविता की मुख्य भाषा मराठी है और उसका हिंदी अनुवाद कविता के नीचे दिया है)


( संदर्भ: भीमा-कोरेगाव प्रकरण जेव्हा ज्वलंत होते, त्यावेळी या कविते ने जन्म घेतला। त्या प्रकरणावरून लक्षात आले की समाजात जेव्हा अन्याय अत्याचार होतो, त्यावेळी सामान्य माणसाची जगण्याची इच्छा कमी होत जाते। अश्यावेळी मनाच्या एका कोपऱ्यात एक विचार जिवंत असतो। या समाजाला बदलण्याचा, न्याय स्थापित करण्याचा। त्याच विचाराने मानवरूप घेऊन समाजाला उद्देशून उपदेश केला आहे, या कवितेच्या माध्यमाने)


हो ,अजून मी जिवंत आहे;

मेलेल्या माणुसकीच्या विभंगलेल्या या जगात,

अजून मी जिवंत आहे!


कोमेजलेल्या आयुष्यावर पडलाय खचलेल्याचा मळ,

भावनाहींन झालेल्या या बाजूना कोठून येईल बळ।

अंधारलेल्या या विश्वात होईल का भावनांचा उदय;

अश्ममय माझे हृदय, अजून जिवंत आहे!


अत्याचाराच्या सागरात बुडाली हास्याची नाव,

किती सहन करावे या शरीराने अपमानाचे घाव।

नको बनावटी मुखवटे नको मला सांत्वनेची ढाल;

या निर्जीव कातड्याची ही साल , अजून जिवंत आहे!


जातीपातीच्या युद्धात रंग झेंड्याचे बदलले,

बदलले सारे लोक आणि सांधे एकीचे तुटले।

बळी या असंतोषाचे शेकडो गेले स्वस्तात;

पण तिरंगा माझ्या रक्तात अजून जिवंत आहे!


शेवटी खेळताना खेळ आयुष्याचा खेळच हरला पाहिजे,

आणि जिंकला जरी तो, नाव माझेच गाजले पाहिजे।

आता हरलोय सारे खेळ तरी आहे जिंकण्याची आशा;

कारण माझी लढण्याची नशा , अजून जिवंत आहे!!


अजून मी जिवंत आहे,

या देशाला, या समाजाला आणि या वृत्तीला बदलण्यासाठी;

हो, अजून मी... जिवंत आहे!!








- डॉ.दिग्विजय जाधव (MBBS)

-२०१८





कविता का हिंदी अनुवाद:-


शीर्षक –“ मैं अभी जिंदा हूं !”


(कविता का संदर्भ – जब भीमा- कोरेगांव का मसला सुलगती हुई आग सा फैल रहा था, तब इस कविता का जन्म हुआ . ऐसा महसूस हुआ कि जब भी इस समाज में कुछ अन्याय अत्याचार होता है तब सबसे ज्यादा हानि सामान्य व्यक्ति की होती है. और अपने आसपास होते हुए अत्याचारों को देखकर किसी भी दिल में यह खयाल आता सकता है के अगर , इतनी मेहनत करने के बाद, अंत यही होने वाला है तो जीवन जीने का क्या अर्थ है उस से भला और आसान तो मौत को गले लगाना है ! लेकिन ऐसी अवस्था में भी एक विचार ह्रदय के अंदर जीवित होता है, जो हमें कहता है कि सारी परिस्थितियां मैं बदलूंगा, सारा अन्याय मिटाकर वहां न्याय की स्थापना करूंगा, खुशहाली लाऊंगा और उसी विचार ने मनुष्य रूप धारण कर इसी समाज को उपदेश दिया है के – मैं अभी जिंदा हूं..)


मैं अभी जिंदा हूं

मरी हुई इंसानियत के टुकड़ों में विभाजित हुए इस संसार में

मैं अभी जिंदा हूं !


मुरझाई हुई मेरी जिंदगी पर चढ़ा है, निष्क्रियता का मल ,

भावनाहीन मेरी बाजुओंको कहा से मिलेगा बल ?

अंधकार भरी इस दुनिया में क्या होंगा भावनाओंका उदय?

अश्ममय मेरा हृदय , अभी जिंदा है !


अत्याचार के समंदर में डूब गई मेरे हास्य की नाव

कब तक सहन करे यह शरीर अपमान के घाव ?

नही चाहिए मुझे फर्जी नकाब न चाहिए सांत्वना की ढाल,

मेरे शरीर की ये निर्जीव खाल , अभी जिंदा है !


जात धर्म के युद्ध में रंग झंडों के बदल गए,

बदल गई इंसानियत और सांधे एकाता के टूट गए !

सैकड़ों लोग इस असंतोष के कारण बलि चढ़ गए,

लेकिन तिरंगा मेरे खून ,में अभी जिंदा है !


जिंदगी के इस खेल के अंत मे खेल ही हार जाना चाहिये,

अगर जीत भी गया वह, लेकीन नाम सिर्फ मेरा गुंजना चाहिये!

अब हार चुका हु मैं सारे खेल, फिर भी है जितने की आशा

क्यूकी मेरी लढने की नशा, अभी जिंदा है !


हां ,

इस समाज को , इस वृत्तिको और इस देश को बदलने के लिए

हा , अभी मै…… जिंदा हू !



By Dr Digvijay Jadhav







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