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मैं अपना खून माफ करती हूँ

Feb 14, 2023
2 min read

By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain


ओ माँ……मैं बात नहीं कर रही इस दुनिया की,

और ना ही बात कर रही हूँ, उस पिता की,

जिसने तेरे दामन में मुझे डाल दिया था।

मैं तो बात कर रही हूँ तेरी हाँ-माँ तेरी

मैं तो तेरे रक्त के हर कतरे में बसती थी,

मेरी रूह,तेरी रूह से मिल ,खिलखिलाकर हँसती थी।

मैं तो तेरे शरीर का ही एक हिस्सा थी,

तेरा हर सपना मेरे अस्तित्व में बसता था।

फिर क्यों? माँ क्यों? मेरी माँ बता क्यों?

मुझे जन्म लेने से पहले ही तूने मार डाला,

अपने बाग की कली कोअपने हाथों ही मसल डाला।




उस समय तेरी आत्मा तनिक भी नहीं काँपी?

तूने अपने आप को दुत्कारा तक नहीं?

अरे हर माँ तो अपने शिशु के लिए भगवान होती है,

पर हाय मेरे तो भगवान ने ही मुझ से मुँह मोड लिया।

क्यों माँ क्यों? तूने यह क्यों किया? क्यों माँ क्यों?

यह क्या माँ? तू रो रही है?

नहीं - माँ- नहीं, तू चुप हो जा-मैं कुछ भी होते हुए देख सकती हूँ,

पर मैं तुझे रोते हुए नहीं देख सकती।

समझ गई मैं तुझे और तेरी मजबूरी को,

तू यह नहीं चाहती कि तेरी कोई मजबूरी कहीं मेरी भी मजबूरी न बन जाए।

जो मुझे खून के आँसू रुला जाए।

क्योंकि माँ और बेटी और का तो एक ही पर्दा हुआ करता है,

तू उस पर्दे को,पर्दा ही रहने देना चाहती है।

जा माँ मैं तेरे कहे बिना ही सब समझ गई,

और कहती हूँ तुझसे कि शुक्रगुजार हूँ तेरी,

जो तूने मुझे दहेज की भयानक अगन से,

तेजाब की असहनीय जलन से,

वहशी दरिंदे समाज की दरिंदगी के किसी ,

शरमनाक मंजर के कहर से बचा लिया।

और मुझे मारकर भ्रूणहत्या का कलंक अपने माथे पर लगा लिया।

जा माँ मैं अपना खून माफ करती हूँ

और तेरी ओर से मैं अपना दिल साफ करती हूँ।


By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain





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