मेरे सपने
By Ashima Varshney
चंद सपने पूरे हुए
कुछ काँच के निकले…
जब समय की ठोकर लगी
चट से चटक गए!
गुड़िया के ब्याह के सपने
पुस्तकों की भेंट चढ़े…
उच्च शिक्षा के सपने
अग्नि वेदी में स्वाहा हुए!
कोमल मधुर स्वप्न
व्यंग बाणों से बिंध गए,
लुभावने सपने
कर्तव्य पथ पर छूट गए!
वर्षों से संजोया सपना
नियति ने निगल लिया,
शेष सभी स्वप्न
राख हो बिखर गए!
उम्र के इस पड़ाव पर
एक स्वप्न ही शेष रहा,
खुद की लाठी के सहारे
अंतिम सफर रहे।
By Ashima Varshney

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