मेरे शहर हो तुम।
By Ajeet Singh
एक शहर है
कई सौ मील
कई सौ रंगों में लिपटा रहता है
कुछ गालियाँ कभी
सहमी सी मिलती हैं
कुछ दरवाज़े बेरंग
दूर दूसरे शहरों को जाती
सड़कें दरारें समेटे मिलती हैं
चेहरे भी देखा करता हूँ
और दाग जो वक्त मिटाना भूल गया
अनसुलझे से सवाल लिए
मुझे देखा करते हैं
कुछ गालियाँ बेजान
रहा करती हैं
या शायद उदास रहती हैं
कदम ढूँढा करती हैं
तुम जो हो
मेरा वो शहर हो
रंगों में लिपटा
कई चेहरों को लिए
चुप चाप पड़ी गलियों
में कहीं चीख़ों को
दबाए हुए सम्भाले हुए
मैं दूर से देखा करता हूँ
तुम्हारे शहर का रस्ता
ढूँढा करता हूँ
By Ajeet Singh

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