मेरे कमरे में बिखरे तुम।
By Ajeet Singh
मैं लिख कर तुम्हें बस पढ़ लेता हूँ
फिर खुद को ये कहते हुए
अक्सर सुना करता हूँ
कि क्या तुम्हें कभी
लिख भी पाया हूँ मैं
इन दिनों आलम ये है
की लिख कर मिटा भी
नहीं पाता तुम्हें
काग़ज़ पर सिमटे हुए तुम
उतने ही अपने लगते हो
जितने तब लगे थे
जब मैं तुमसे रूबरू था
सामने तो थे तुम
पर मैं तुम्हारी आँखों में नहीं था
वो तो ठहरी गहरी नीले रंग की झीलें
मुझे अब आदत कहाँ
तुम तो जानते भी नहीं
कि लकीर दर लकीर
मेरे हिस्से की मोहब्बत
मैंने लिख कर अपने ही
कमरे में बिखेर दी है
तुम आओगे तो जान आ जाए शायद
नहीं आओगे तो कलम
ज़िंदा भी है
और रवाँ bhi
By Ajeet Singh

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