मेरे 'annoying half'
By Siddharth Surana
भाई कहूँ या मेरे 'annoying half'
क्या ही फ़र्क पड़ता है?
चाहे जितनी बार झगड़ता हो चॉकलेट के लिए
लेकिन तू ही है ना जो सड़क पार करते वक्त सबसे पहले मेरा हाथ पकड़ता है।
आपकी-मेरी शरारतों से खिलखिला उठते थे ये आँगन और दिवारें,
फिर रात को हम छत पर बैठ कर ना जाने क्यों गिनते थे ये अनगिनत तारें?
आपकी कलाई सबसे सुंदर लगे इसलिए तमाम दुकाने-गलियां छान आती हूँ ,
राखी से एक महिना पहले ही गिफ्ट के लिए
पूरे दिन दिमाग खा लेती हूँ |
मुझे डर हो किस बात का जब आप साये की तरह हमेंशा मेरे साथ चलते हो,
मुझे ना हो कोई परेशानी इसलिए मेरी धूप में शायद आप भी थोड़ा जल लेते हो।
चोटी खींच कर मेरी, मुझे बड़ा रिझाया आपने
लेकिन कांधे पे अपने बैठा कर पूरा घर भी घुमाया आपने|
कभी पापा की तरह आप डांटते तो
कभी दोस्त बनके आपसे सीक्रेट शेयर करती हूँ ,
भैया आपके साथ ज़िंदगी का हर लम्हा
खूबसूरती के साथ जीना सीखती हूँ।
खूबसूरती के साथ जीना सीखती हूँ।
By Siddharth Surana

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