मेरी प्यारी बिटिया!
Updated: Aug 6, 2025
By Mukta Sharma Tripathi
मेरी प्यारी बिटिया!
जब तुम स्कूल, टयूशन या
किसी भी एक्टिविटी के लिए।
घर से निकलो!
तो सुनो!
सबसे पहले
अपने घर के गेट पर ही
तनिक रुका करो।
केवल दाएँ-बाएँ ही नहीं!
देखो! चारों तरफ देखा करो!
कि कहीं कोई चील!
नजर गढ़ाए, बेचैन सा,
मेरी चिड़िया की ताक में तो
नहीं बैठा!!
फिर
साइकिल के पैडल पर
कदम बढ़ा!
या स्कूटी का गेयर चढ़ा!
चल पड़ना तुम अपने गंतव्य पर।
मगर नहीं-नहीं
अभी भी संतुष्ट मत होना!!
आगे चलते।
पथ पर बढ़ते।
साइकिल के या स्कूटी के
दोनों हैंडल पर,
साइड मिरर की आँखों से
दूर खड़े दुश्मन पर भी
नज़र टिकाए रखना।
क्योंकि इन कुटिल बुद्धि वालों के
हाथों में मोबाइल हैं तो
इसलिए
तुम स्वयं ही स्वयं को
इनकी कुटिल चाल से बचाए रखना।
उफ़! बहुत कठिन है!
दिल पर पत्थर रख कर।
ये सब समझाना!
और बिटिया को रोज़
स्व-जातीय जन की भीड़ में
बारंबार भेजते जाना।
हे भगवान!
कुछ तुम ही मदद करो ना!
भगवान! क्या आप मान गये?
वाह! तो सुनो!
बस तुम इतनी कृपा करो कि
मेरी बिटिया को
दो आँखें और!
माथे की विपरीत दिशा में भी लगा देना।
कंधों पर बेहद नुकीले पेंच अड़ा देना।।
ताकि कोई मेरी बिटिया को छू ना सके।
और अगर
कोई निकृष्ट हाथ बढ़ाए भी तो
ये पेंच उसकी उँगलियों को कुछ ऐसे दें चीर।
मानो गीली बालू पर
एक बालक की छड़ी से
बहुत ही गहरी, रिसती, खींची हुई लकीर।।
भगवान आप लिख लो!
लिस्ट लंबी है।
तो हाँ! लिखो।
उसकी चाल में
आप चीते सी गति भर देना।
और हो सके तो
उसके शरीर में जरा सी
बिजली प्रवाह कर देना।।
ताकि जो भी चील
मेरी लाडो की तरफ बढ़े।
वह वहीं
बिजली की तार पर अड़े
परिंदे की तरह टंग जाए।
बस वहीं वह
निकृष्ट पंख समेत जल जाए।।
और फिर कभी,
किसी भी बिटिया के तन को
बेदर्दी से ना पढ़ पाए।।
हाँ! समझी!
ये तो नामुमकिन है!
चलो रहने दो!
मैं ही कुछ करती हूँ।
मैं माँ!
कल्पना युग में
अपनी बिट्टो के पथ में खींच कर रेखा!
अब ना अपना हृदय भींचती हूँ।।
मैं, मेरी बिटिया की चेतना में
उसी झांसी की रानी
लक्ष्मीबाई का चित्र खींचती हूँ।।
साहस का बीजकर, बीज
उस छोटे से हृदय में
आकाश भर,
वीरता, निर्भीकता सींचती हूँ।।
By Mukta Sharma Tripathi

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