मेरी परी
By Richa tomar
स्त्री-पुरुष के रिश्तों के भिन्न-भिन्न रूपों में से एक.."पिता-बेटी' का रिश्ता!
अगर पवित्रता और निस्वार्थता की हद देखनी हो तो इससे बेहतर कोई और रिश्ता नहीं मिलेगासबसे प्यारा,अनोखा,गहरा और अजीज।
एक बेटी बनकर तो कई बार लिखा..आज कोशिश है एक पिता बनकर लिखने की..!
...मेरी परी जब मैंने तुम्हारी माँ को पहली बार देखा था,तो ऐसा लगा मानो स्वर्ग से अप्सरा उतर आई हो; लगा कि ईश्वर ने मेरे सारे जख्मों के बदले मुझ इस रिश्ते से नवाजा है...मेरा जीवन बहत खुशहाल जा रहा था..मैं रूठता,वो मना लेती. मैं जिद करता,वो खुद को झुका देती.उसके बिना मैं रह नहीं पाता था,उसे उसके मायके भी नहीं जाने देता था, उससे दूरी मेरे लिए आसान नहीं होती थी...जब कभी वो इस बात से उदास होती थी तो मैं उसे घुमाने ले जाता,बहुत सारे उपहार दिलाता!...वो दिन-भर मेरे घर और मुझे संवारने में लगी रहती थी. और मैं शाम को आकर बस फरमाइशों की लाइन लगाता....
पर एक दिन उसने मुझे एक तोहफे से नवाजा..एक नन्ही सी जान जिसने मुझे पिता बनने का अद्वितीय अहसास दिया..."वो थी तुम"
जब पहली बार मैंने तुम्हें गोद में उठाया..मेरी बत्तीसी बाहर आए जा रही थी और आँखों में नमी थी...वो अहसास जिसे मैं शब्दों में बया न कर पाऊ। फिर हर दिन मानो त्योहार सा होने लगा...तुम्हारे हेंसने रोने से मेरा आशियाना गूंजने लगा.। तुम जब अपनी बिना दांतों की मुस्कान से मेरी तरफ देखती, ऐसा लगता मानो मुझपर हरश्रगार के फूलों की बरसात हो रही हो और मेरा रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठता । जब तुम रोती, तो ऐसा लगता मानो सैकड़ो कटारियां किसी ने एक साथ मुझ पर चला दी हो....तरह तरह के जतन करता तुम्हें मनाने को,जब तुम मुझसे रूठ जाती...तुम्हारी हर फरमाइश पूरी कर पाना मुझे सुकून की नींद लेने के काबिल बनाता. फिर जब तुमने अपने नन्हे कदमों से मेरी उँगली पकडकर चलना शुरू किया ऐसा लगता मानो मैं ब्रहमाड को अपनी उँगली से चला रहा हूँ! तुम्हारे साथ हंसने-खेलने, अपने कंधों पर बैठाकर तुम्हें घुमाना, वो रूठना-मनाना इन सबमें देखते ही देखते दिन महीने.साल ...बीत गए।
अब जब बात तुम्हें ब्याहने की आती है.तो धक्क सी हो जाती है.....मैं कैसे इस परी को, किसी और को सौप पाऊंगा, .?? नहीं-नहीं मैं हमेशा तुम्हें अपने साथ अपने सीने से लगाकर ही रखूगा...तुम्हारे बिना ...कौन मेरा ख्याल रखेगा,कौन मुझे गुटका खाने से रोकेगा...कौन मुझे घर देर से आने पर डाटेगा...कौन घर से बाहर जाने पर मुझे तब तक निहारेगा.जब तक मैं आँखों से ओझल न हो जाऊ। कौन मुझसे दादियों सा ज्ञान देगा... कौन झपटकर मेरे गले लगेगा????किसी और की तो मैं सुनता ही कहाँ है....!
आज मैंने पहली बार तुम्हारी माँ को एक पिता की हैसियत से देखा और बस निःशब्द हो, उसकी गोद में सिर रखकर लेट गया..
खैर बेटियाँ तो जन्मों से ही पराई हैं. कौन उन्हें अपने पास रख पाया है। समय के इस फेर में देखते हैं पहले किसकी विदाई होती है....एक बेटी की या एक पिता की... जिसकी भी हो..! मेरी परी तुम मुझसे वादा करो!, कि तुम कभी कमजोर नहीं पड़ोगी!...जब मैं तुम्हारे साथ न होऊ तो तुम रोना मत, वरना मैं सुकून से सो नहीं पाऊंगा....तुम मजबूत बनना...और भी ज्यादा मजबूत!....अपनी जिन्दगी से तो तब तक हार मत मानना जबतक समय तुम् न ले जाए....तुम उडान भरना, ऊँची से ऊँची... जितनी ऊँची तुम्हारी उड़ान होगी उतनी बड़ी मेरी शान होगी दुनिया घूमना... सबका सहारा बनना! जो भी काम में नहीं कर पाया वो सब तुम्हारे सुपुर्द करता हूँ.! कभी भी इरना-घबराना मत. खुदको अकेला मत समझना.... बस मुझे एक बार पुकार लेना: अगर आसमानों भी हुआ.तब भी झट से तुम्हारे पास आ जाऊंगा! मुझे खुद से ज्यादा तुम पर विश्वास है मेरी परी!...तुम ही हो जो मुझे. मुझसे भी ज्यादा अजीज हो। तुम्हारी खिलखिलाहट मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार होगा। मेरी परी..ल.००
By Richa tomar

Comments