मेरी कविताऍं
By Harshita Shrimali
मेरी कवितायें,
ये सिर्फ कवितायें नहीं, मेरी बातें हैं।
जिन्हें हर कोई नहीं समझ सकता।
मेरी भावनाएँ हैं,
जो शब्दों को एक जगह, एक डोरी में पिरो देती हैं।
जब मैं कुछ ना कहती हूॅं, तब मैं कविता रचती हूॅं।
और इन पंक्तियों को, इन भावनाओं को,
केवल एक व्यक्ति ही समझ सकता है।
जो स्वयं इन्हें जी चुका हो, या फिर जीकर भी ना जिया हो।
लेकिन मैं तो इन भावनाओं को रोज जी रही हूँ,
रोज ही गुज़र रही हूँ इन्हीं गलियों से।
पर मैं क्यों नहीं बदल देती अपना रास्ता,
जिससे मेरी मंजिल भी बदल जाएँ।
बदलाव मैं भी चाहती हूॅं पर,
ये बदलाव अच्छा होगा या बुरा,
ये मैं भी नही जानती हूँ।
खुली आँखों से ख्वाब अच्छे लगते हैं,
और आँखें बन्द हो जाएं तो अंधेरा दिखने लगता हैं।
क्या मेरे आस-पास अंधेरा होना यह तो नहीं कहता कि,
मैं स्वयं उजाला हूॅं।
क्योकि मैं खुद को देख नहीं पा रही,
दिख रहा है तो ये अंधेरा जो धीरे धीरे बढ रहा है।
खैर ये हैं मेरी कवितायें,
जिनसे मुझे लगाव भी है, जुड़ाव भी है।
कुछ कहती है, ये मुझसे और मैं इनसे।
हम दोनों ही बातें करते हैं,
एक-दूसरे में झाँकते हैं।
सोचना नहीं पड़ता तुम्हें लिखने से पहले,
और तुम भी मेरी कलम के हिसाब से चलती रहती हो।
अच्छी लगती हैं ये बातें, ये रातें,
ये कामनाएँ, कुछ भावनाएँ।
क्योंकि ये मेरी कवितायें।
By Harshita Shrimali

Comments