मेरी कलम
By Kapil Chugh
मैं जब कभी लिखता हूं
कलम मुझे पढ़ती है
जांचती है मेरे भावों को
हताश, विचलित, आंखों को।
पन्ने फाड़ फेंकते हाथों को।
फिर फिसलती है उंगलियों से
और निर्णय जैसे करती है
मेरी पराजित लेखनी का
अव्यक्त, अस्पष्ट, कल्पना का।
सतर्क हो मैं, सकते में आ
कलम को परे फेंकता हूं
दोषी एक हारे लेखक का
कलम की जीत में देखता हूं।
और ना लिखने का निर्णय
स्वयं के विपक्ष में देकर
अपनी दिनचर्या के उसी
कारागार में चला जाता हूं।
By Kapil Chugh

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