मेरा दायरा
By Monica Singh
वो जो पहले एक होने को तरसता है,
शादी के बाद हर बात पर बरसता है,
मेरे मन की उसे परवाह नहीं
बस अदाओं पर ही मरता है।
मेरा दायरा आख़िर कौन और क्यों तय करता है?
मेरे आने पर जग ने कहा कि घर लक्ष्मी आयी है
दुःख छुपा खुश रहने की कला भी सबने,क्या ख़ूब पायी है
लड़के के लिए जब लानी हो तो सबसे अच्छी चाहिए,
पर खुद के घर पैदा होने से,हर कोई डरता है
मेरा दायरा आख़िर कौन और क्यों तय करता है?
छोटी थी तो मुझे स्कर्ट से ज़्यादा पतलून भाती थी,
चाबी वाली गुड़िया नहीं,बैट बॉल वाली बॉल पसंद आती थी।
मेरी पसंद पर नानी दादी ने भी ऐतराज जताया था,
बैटरी वाली कार छीन हाथ में किचन सेट थमाया था।
कहा कि मर्द औरत अपना अपना फ़र्ज़ निभाएँ तभी तो ज़माना चलता है..
पर मेरा दायरा आख़िर कौन और क्यों तय करता है?
पापा नहीं चाहते थे..पापा नहीं चाहते थे..
कि जीवन की सम्भावनाओं से वंचित मैं रह जाऊँ
हुनर डुबाए जाते हैं जिसमें,उस दरिया में ना बह जाऊँ..
मुझ डूबते का तिनका बन ने पर
वो अक्सर सवालों में घिरा करता है.
अपनी ही औलाद के हक़ के लिए..वो जमाने से लड़ता है..
पर मेरा दायरा आख़िर कौन और क्यों तय करता है?
हर साल बीते सुना के स्कूल से कब हटा रही हो?
जो आगे जा कर करने हैं,घर के काम कब सिखा रही हो?
माँ को हर औरत ये मशवरा दिया करती थी..
मेरी ख़ुशी घट जाती थी,जब एक जमात बढ़ती थी।
मुझसे कम प्यार करने की सलाह दिया करते थे..
ये तो एक दिन चली जाएगी,बार बार इत्तेलह किया करते थे।
इसी सोच से मासूमों का ख़्वाब बिखरता है
मेरा दायरा आख़िर कौन और क्यों तय करता है?
काम पर भी इसी भेदभाव का सामना करती हूँ
संघर्ष उनसे ज़्यादा,पर बराबरी तक के लिए लड़ती हूँ ।
मेरी लाख कोशिशों पर भी मुझे कमज़ोर बताया जाता है,
मुझसे बहती लाल स्याही का मुझे ही
ज़िम्मेदार ठहराया जाता है।
खुदा का बनाया ये नियम भी,इन सबको अखरता है,
मेरा दायरा आख़िर कौन और क्यों तय करता है?
By Monica Singh

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