मेरा घर, मेरा शहर
By Meenali Gulati
अक्सर हम बचपन से ही घर को
अपना शहर समझ लेते हैं,
अपने परिवारों को ही विभिन्न रूपों में
संसार समझ लेते हैं।
मैं दिल्ली से हूँ, मैं स्कूल और कॉलेज में गर्व से बताती थी
साकेत में मेरा घर है, खूब इठलाती थी।
जब बड़ी हुई, कुछ नया सा लगने लगा
शादी के बाद, लाजपत नगर भी विदेश जैसा लगने लगा।
ज़्यादा देर नहीं लगी पर, अलग घर में ढलने में
आखिर शहर तो वही था, गलियां नई भी पुरानी लग पड़ीं।
शहर क्या है आखिर - लोग, मकान, इमारतें और दुकानें
वह पार्क स्कूल अस्पताल या ऑफिस हैं, इनकी पहचान।
शहर के प्रति प्रेम है तो क्यों
क्या अगर इंसान सफल हुआ तो मिलता है इन्हें यह मकाम ?
अक्सर दिल्ली में अलग अलग शहरों से लोग आते हैं
जब वे इस शहर में बस जाते हैं तो हम मिलकर शहर बनाते हैं।
अच्छा या बुरा, साफ या गंदा, नेक या चालाक,
हम इसका चेहरा बन जाते हैं।
हम ही हैं जो इसको सवारते हैं और
हम ही इसको सबसे प्रिय बनाते हैं।
By Meenali Gulati

So well put!
100 % apna sahar is a vibe
Apna shahar apna hota hai
So true. 🤩
Wonderful poetry with so many emotions