मेरा क़त्ल
Updated: Jul 18, 2025
By Naveen Kumar
क़त्ल जब हो रहा था मेरा
ये जमाना मुश्कुरा रहा था
मेरे अश्कों से, अपने आसमां को रंग रहा था
मेरे तड़प, मेरे रोने से
वो अपने संगीत की धुन को बुन रहा था
खून के हर एक कतरे से
नई डलियां सींच रहा था
सुर्ख लाली में माटी खूब चमक रही थी
उस पर फूल खिल कर खूब महक रहे थे
शरद आने पर कुछ ऐसी हवा चली
तिल–तिल कर के ये जिस्म उसमें जा जमा
फिर मौसम बदला नई ऋतु आ गई
जिस्म के साथ मिट्टी भी बहा ले गई
न वजूद बचा न उसका निशा
जमाना अब वही था
और मुश्कुरा रहा था
किसी और के क़त्ल पे
By Naveen Kumar

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