मृत्युंजय
By Kunal Rajendra Suryavanshi
हर किरदार की एक कहा़नी हैं |
हर कहानी कें कुछ़ किरदार हैं |
उसमें सें एक किरदार कर्ण हैं |
और कहानीं महाभारत जैसीं स्वर्ण है|
कहानी की शुरूआत होती सारीपाट सें |
शतकों में कौरव और पांडव भी पाॅंच थे |
कहानीं कीं जड़ ही साम, दाम, दंड, भेद है |
कान्हा के हाथो यें फासे ये खेल कें |
इधर ना कोई अपना सगा़ ना कोई अपना मित्र है |
जिस मिट्टी के कण-कण में कर्ण है वो किरदार कुरूक्षेत्र है|
गंगा माँ का लाड़ला जो और सूर्य की संतान वो |
सुत ना क्षत्रिय है जिसे था अंजान वो |
सगें खून से हारना क्या होता है ये जा कें उससे पुछ लो |
हक माॅंगने गया था मैं कहतें हें श्रापों कीं तुम भीख़ लो |
महाभारत के पेड़पर जैसा सुनेहरा पर्ण हैं |
उसके जैंसा न दूजा कोई नाम उसका कर्ण हैं |
चाहें सुत हुॅं या क्षत्रिय मुझें लड़ने का पूरा हक हैं |
श्रापों से घिरा, वचनों में बंधा
ना जाने कैंसा ये सबक़ हैं |
हाॅं मानता हूॅं मैंने गलत का साथ दे दिया |
गलती तो सब ने की थी फिर भी मैं ज्यादा गलत हो गया|
ये कहानी धर्म की अधर्म सें थी ही नहीं |
कर्ण की जिंदगी किसी ने जीं ही नहीं |
युहीं नहीं वो दानवीर कहलाता,
भगवानों कों भी दान में जान आजतक किसीं नें दीं नहीं|
मरा हूॅं मैं, मेरी हड्डियाॅं गली है
आज भी कुरूक्षेत्र में मेंरी साॅंसे चलीं हैं |
हारा हूँ मैं लेकिन फिर भी मैं मृत्युंजय |
कर्म,के ऊपर कोई नहीं होता यहीं धर्म का विजय !
By Kunal Rajendra Suryavanshi

Fabulous ✨🔥
Pure emotions poured into the work, the result of which, is on the screen. Depicting the life of Karna in a way many would not perceive is a daunting task that is handled so well by the poet (Kunal). Awesome job! 👏
Great ✨
Great