मृत्यु से संवाद
By Sushmita Sharma
ठक- ठक हुई, दरवाजे पर दस्तक,
खोला पट, न दिखा कोई मस्तक,
बंद कर पट, पलटा कमरे में,
दूर कोने में दिखी एक खूबसूरत झलक।
साश्चर्य से जाकर पूछा,
आप कौन? क्या सेवा करूं आपकी?
पधारने का प्रयोजन क्या है?
क्यों कोई ना आहट आने की?
सुंदर, शांत ,सौम्य सा चेहरा,
आंखों में तेज व गहराई लिए,
मुस्कुराते से अधर ,धीमे से बोले-
मृत्यु हूँ मैं,जाना है तुम्हें साथ लिए।
साँस रुकने लगी, दिल कंठ तक उछल पड़ा,
मस्तिष्क का सोचना होने लगा कम,
अब तक सुना था, यमदूत आते हैं लेने,
यहाँ तो मुझे ले जाने, आए दो खूबसूरत कदम।
किसी तरह कंपकंपाते होठों से,
पूछा मैंने- ‘हे त्रिपुरा सुंदरी’,
क्यों मुझे ले जाना है?
जिंदगी मेरी हुई न पूरी।
कानों में गूंजने लगी,
जोर से खिलखिलाने की आवाज,
रुक कर बोली- मुझे देख यही कहते हैं सब,
नहीं चाहता कोई नया आगाज़ ।
जन्म मृत्यु तो निश्चित है,
बीच का सफर तुम्हें जीना है,
कर्म तुम्हारे तय करते हैं,
किस रूप में परिवर्तित होना है।
मौत का डर सबको सताता है,
पर यह कोई समझ ना पाता है ,
मृत्यु भी खूबसूरत मिलती है,
जब कर्म बाजी मार ले जाता है।
प्यार बाँटो, खुशियाँ फैलाओ,
सबके लिए मदद का हाथ बढ़ाओ,
द्वेष, क्लेश ना मन में पालो,
कर्म की राह पर बढ़ते जाओ।
फिर देखो आगे का चमत्कार,
जिंदगी तो खूबसूरत, मृत्यु भी लाजवाब,
अब चलने का कष्ट नहीं,
ले चलूंगी तुम्हें,कर पलकों पर सवार।
सुनकर कथन यह, व्याकुल मन को मिली राहत,
जिंदगी व्यर्थ ना जी, अब ना कोई शिकायत,
धन्य हो देवी, जो यह मौत मुझे नसीब है,
नाज़ है मुझे खुद पर, मुझ सा ना कोई खुश नसीब है।
By Sushmita Sharma

😘❤️
Beautiful lines
Very nicely written 👍🏻
Very nicely written and very true
Very nice written