मुसव्विर ये तूने बनाया ही क्या है
By Ananth
मुसव्विर तेरी जो मैं तस्वीर देखूँ
समझ मैं ना पाऊँ इरादों को तेरे
कि हर शय जो इसमें बनाई है तूने
ये मौजूद है बस सबब के बिना ही
या मक़सद तेरा कोई था इनके पीछे
क्या इन रंगों को इत्तेफ़ाकन मैं समझूँ
ये इक सुर्ख़ सूरज, फ़लक सुर्मई सी
वो पत्ते शजर पे हैं जो ज़र्द सारे
बता करते हैं क्या ये सब कुछ इशारे
इन्हें शाम, पतझड़ के पैग़ाम समझूँ?
जो पल भर इन्हें अनसुना भी करूँ मैं
मुख़ालिफ़ दलीलों को भी जाँच लूँ मैं
जमीं सब्ज़ है और रंगीन गुल हैं
नदी बह रही है पहाड़ों से नीली
बसा वो कोई शहर भी लग रहा है
तो क्या ये समझ लूँ कि है सुब्ह आयी?
अगर झड़ रहा कुछ तो खिल भी रहा कुछ
तरक़्क़ी के आसार मिल ही रहें हैं
करूँ ऐसी बुनियाद पे फ़ैसला क्या?
मैं मतलब निकालूँ भला या बुरा क्या?
किसी क़िस्म का भी मैं तुक कोई ढूँढूँ?
मगर पूछ लेता हूँ फिर मैं ये ख़ुद से
तवक़्क़ो2 समझने की रखता ही क्यों हूँ
मैं क्यों ढूँढता रहता हूँ कोई मक़सद
सबब आदतन खोजता क्यों सभी का?
कहीं ऐन मुमकिन3 क्या ऐसा नहीं है
सबब और मक़सद फ़क़त4 वहम ही हैं
कि जो भी है इक बस ये तस्वीर ही है
परत पे परत और कुछ भी नहीं है
न अच्छा-बुरा है, न पैग़ाम कोई
छिपा कुछ नहीं, जो भी ढूँढो यही है
ये तस्वीर कहती नहीं और कुछ भी
मैं सोचूँ क्या ऐसा नहीं ऐन मुमकिन
ये बस इक बयां है तेरे शौक़ का ही
कि तूने उतारी है कैन्वस पर अपनी
वो दीवानगी जो कहीं मुझमें भी है
तजस्सुस5 तो है अब भी लेकिन, मुसव्विर
मुसव्विर तेरी जो मैं तस्वीर देखूँ
समझ मैं ना पाऊँ इरादों को तेरे
1 कलाकार (आर्टिस्ट/पेंटर)
2आशा/अभिलाषा/उम्मीद
3मुमकिन होने की गुंजाइश का होना
4सिर्फ़
5जिज्ञासा
By Ananth

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